kya phir koi taqreeb-e-mulaqaat na hogii | क्या फिर कोई तक़रीब-ए-मुलाक़ात न होगी

  - Dr. Ahmar Rifai
क्याफिरकोईतक़रीब-ए-मुलाक़ातहोगी
क्यायूँँहीचलेजाओगेकुछबातहोगी
क्याता-ब-क़यामतयूँँसुलगतेहीरहेंगे
इसज़ुल्म-ए-मुसलसलकीमुकाफ़ातहोगी
अबआलम-ए-हैरतमेंगुज़रजाएँगी'उम्रें
अबदिनकातोक्याज़िक्रकभीरातहोगी
लेजाओयेदिलभीकिअमानतहैतुम्हारी
देजाओअगरदाग़बड़ीबातहोगी
येज़ीस्ततिरेहिज्रमेंजान-ए-तमन्ना
क्याहोगीअगरमंज़िल-ए-आफ़ातहोगी
अबदिलपेजोगुज़रेगीफ़क़तदिलमेंरहेगी
अबरस्म-ओ-रह-ए-शुक्र-ओ-शिकायातहोगी
एहसासपेइकग़मकीघटाछाईहुईहै
अबकौनसामौसमहैकिबरसातहोगी
  - Dr. Ahmar Rifai
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