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Dipendra Singh 'Raaz'
parindon ki bhi fitrat sach kahooñ aulaad jaisi hai
parindon ki bhi fitrat sach kahooñ aulaad jaisi hai | परिंदों की भी फितरत सच कहूँ औलाद जैसी है
- Dipendra Singh 'Raaz'
परिंदों
की
भी
फितरत
सच
कहूँ
औलाद
जैसी
है
निकल
आते
हैं
जब
पर
तो
शजर
को
छोड़
देते
हैं
- Dipendra Singh 'Raaz'
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है
दुख
तो
कह
दो
किसी
पेड़
से
परिंदे
से
अब
आदमी
का
भरोसा
नहीं
है
प्यारे
कोई
Madan Mohan Danish
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मुझ
पर
निगाह-ए-नाज़
का
जब
जादू
चल
गया
मैं
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ैस
की
सोहबत
में
ढल
गया
ज़ुल्फें
उन्होंने
खोल
के
बिखराई
थी
शजर
फिर
देखते
ही
देखते
मौसम
बदल
गया
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Shajar Abbas
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जिसे
तुम
काट
आए
उस
शजर
को
ढूँढता
होगा
परिंदा
लौटकर
के
अपने
घर
को
ढूँढता
होगा
Bhaskar Shukla
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दोस्त
अपना
हक़
अदा
करने
लगे
बेवफ़ाई
हमनवा
करने
लगे
मेरे
घर
से
एक
चिंगारी
उठी
पेड़
पत्ते
सब
हवा
करने
लगे
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Santosh S Singh
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इसी
से
जान
गया
मैं
कि
बख़्त
ढलने
लगे
मैं
थक
के
छाँव
में
बैठा
तो
पेड़
चलने
लगे
मैं
दे
रहा
था
सहारे
तो
इक
हुजूम
में
था
जो
गिर
पड़ा
तो
सभी
रास्ता
बदलने
लगे
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Farhat Abbas Shah
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पेड़
मुझे
हसरत
से
देखा
करते
थे
मैं
जंगल
में
पानी
लाया
करता
था
Tehzeeb Hafi
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क़ल्ब-ए-हज़ी
मता-ए-जाँ
यूँँ
शाद
कीजिए
कसरत
के
साथ
आप
हमें
याद
कीजिए
दौलत
में
चाहते
हो
इज़ाफा
अगर
शजर
तो
बेकसों
यतीमों
की
इमदाद
कीजिए
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Shajar Abbas
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वो
पेड़
जिस
की
छाँव
में
कटी
थी
उम्र
गाँव
में
मैं
चूम
चूम
थक
गया
मगर
ये
दिल
भरा
नहीं
Hammad Niyazi
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एक
साया
है
घने
पेड़
का
मेरे
सर
पर
एक
आँचल
से
मुझे
ठंडी
हवा
आती
है
Binte Reshma
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वो
पास
क्या
ज़रा
सा
मुस्कुरा
के
बैठ
गया
मैं
इस
मज़ाक़
को
दिल
से
लगा
के
बैठ
गया
दरख़्त
काट
के
जब
थक
गया
लकड़हारा
तो
इक
दरख़्त
के
साए
में
जा
के
बैठ
गया
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Zubair Ali Tabish
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तुम्हारे
इश्क़
से
मुझको
अता
हुए
थे
जो
तमाम
ज़ख़्म
वो
मैंने
सदा
हरे
रक्खे
Dipendra Singh 'Raaz'
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याद
आती
है
तुम्हारी
जैसे
मुझको
काश
आ
जाओ
अचानक
तुम
भी
वैसे
Dipendra Singh 'Raaz'
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गिला
उस
सेे
भला
किस
बात
का
अब
मैं
करूँँ
यारों
ख़ुदा
ने
ही
मुकद्दर
में
मुहब्बत
जब
नहीं
लिक्खी
Dipendra Singh 'Raaz'
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अश्क,
तन्हाई,
ग़म-ए-हिज्र,
उदासी,
वहशत
ये
सभी
लफ़्ज़
निचोड़े
तो
जा
के
इश्क़
बना
Dipendra Singh 'Raaz'
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ना-मुकम्मल
फिर
हुई
मेरी
ग़ज़ल
शे'र
फिर
तन्हा
हुआ,
मेरी
तरह
Dipendra Singh 'Raaz'
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