husn ke gun gin sakoon ye gun kahaan rakhta hooñ main | हुस्न के गुन गिन सकूँ ये गुन कहाँ रखता हूँ मैं

  - Chaudhary Moinuddin Usmani Arif
हुस्नकेगुनगिनसकूँयेगुनकहाँरखताहूँमैं
लबनहींखुलतेमगरज़ौक़-ए-बयाँरखताहूँमैं
लौजहाँदीशम्अनेमैंभीतड़पकरजलबुझा
फ़ितरत-ए-परवाना-ए-आतिश-बजाँरखताहूँमैं
फिरमिरेदामनमेंकोईफूलखिलताहीनहीं
जबज़राक़ाबूमेंचश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँरखताहूँमैं
बे-लुटाएकटनहींसकतीमताअ'-ए-इश्क़-ए-दोस्त
दौलत-ए-बेगाना-ए-ख़ौफ़-ए-ज़माँरखताहूँमैं
गुलशन-ए-जम्हूरहोयाजन्नत-ए-मज़दूरहो
कुछअलगइनसेज़मीन-ओ-आसमाँरखताहूँमैं
तोड़देताहैतिलिस्म-ए-हर-निज़ाम-ए-पुर-फ़रेब
दिलमेंजोदर्द-ए-कसाँ-ओ-ना-कसाँरखताहूँमैं
ख़िरमन-ए-बातिलउन्हींसेहोगा'आरिफ़'शो'ला-रू
फ़िक्रकीहरमौजमेंवोबिजलियाँरखताहूँमैं
  - Chaudhary Moinuddin Usmani Arif
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