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Karan Bedi
chalne se rokni hai mujh ko hawa shaam ke baad
chalne se rokni hai mujh ko hawa shaam ke baad | चलने से रोकनी है मुझ को हवा शाम के बाद
- Karan Bedi
चलने
से
रोकनी
है
मुझ
को
हवा
शाम
के
बाद
छत
पे
आती
है
जलाने
वो
दिया
शाम
के
बाद
सारा
दिन
जिस
को
भुलाने
में
निकल
जाता
है
करता
हूँ
उस
से
ही
मिलने
की
दु'आ
शाम
के
बाद
- Karan Bedi
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लोग
तब
तलक
साथ
चलते
हैं
जब
तक
उनके
मतलब
निकलते
हैं
बिक
चुका
है
ईमान
लोगों
का
दिल
हर
एक
शय
पर
फिसलते
हैं
आज
कल
के
लोगों
को
क्या
पता
रिश्ते
किस
तरह
से
सँभलते
हैं
हो
भी
सकती
हैं
मंज़िलें
अलग
चल
अभी
तो
हम
साथ
चलते
हैं
उम्र
जैसे
जैसे
बदलती
है
शौक़
उस
तरह
ही
बदलते
हैं
ग़म
भी
अच्छे
लगते
हैं
सुनने
में
शा'इरी
में
ग़म
जब
भी
ढलते
हैं
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Karan Bedi
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हर
एक
शख़्स
में
उस
को
तलाशता
हूँ
मैं
वो
मुझ
को
अपना
तलबगार
कर
के
छोड़
गया
Karan Bedi
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सभी
ने
देखा
बस
चेहरा
हमारा
किसी
ने
दिल
नहीं
देखा
हमारा
नहीं
टिक
पाया
इक
रिश्ता
हमारा
हमें
ले
डूबा
ये
ग़ुस्सा
हमारा
तुम्हें
हाँ
की
थी
अच्छा
सोचकर
पर
ग़लत
निकला
है
अंदाज़ा
हमारा
जहाँ
में
बाँटता
फिरता
है
वो
इश्क़
जो
होना
चाहिए
हिस्सा
हमारा
मिले
जब
जिस्म
आपस
में
हमारे
तो
रिश्ता
हो
गया
गहरा
हमारा
बड़ी
आसानी
से
बोला
उन्होंने
'करन'
अब
कुछ
नहीं
लगता
हमारा
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Karan Bedi
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जो
असर
दूर
होकर
हुआ
लगता
है
सिर्फ़
मुझ
पर
हुआ
उसका
तो
हाल
अच्छा
है
पर
अपना
ही
बद
से
बदतर
हुआ
उसको
खो
देने
का
डर
मेरा
ख़त्म
भी
उसको
खोकर
हुआ
दिल
ने
खाई
है
ठोकर
बहुत
यूँँ
ही
थोड़ी
ये
पत्थर
हुआ
दूर
होकर
हुई
अच्छी
चीज़
टूटा
दिल
तो
सुख़न-वर
हुआ
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Karan Bedi
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इक
मकीं
था
जो
यहाँ
रहता
था
बरसों
पहले
आस
में
उसकी
हमेशा
ये
मकाँ
रहता
है
Karan Bedi
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