purkhon ki boo baas li.e firta hooñ | पुरखों की बू बास लिए फिरता हूँ

  - Badr Jameel
पुरखोंकीबूबासलिएफिरताहूँ
मुट्ठीभरएहसासलिएफिरताहूँ
चारोंओरसमुंदरऔरमैंपलपल
एकअनजानीप्यासलिएफिरताहूँ
रामकोतोबन-बासलिएफिरताथा
मैंख़ुदमेंबन-बासलिएफिरताहूँ
महफ़िलमहफ़िलख़ेमा-ज़नमायूसी
मंज़िलमंज़िलआसलिएफिरताहूँ
हरमौसमकाकर्बछुपाहैमुझमें
मैंहररुतकीप्यासलिएफिरताहूँ
  - Badr Jameel
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