tumhaari yaad ke deepak bhi ab jalana kya | तुम्हारी याद के दीपक भी अब जलाना क्या

  - Azhar Iqbal
तुम्हारीयादकेदीपकभीअबजलानाक्या
जुदाहुएहैंतोअहद-ए-वफ़ानिभानाक्या
बसीतहोनेलगीशहर-ए-जाँपेतारीकी
खुलाहुआहैकहींपरशराब-ख़ानाक्या
खड़ेहुएहोमियाँगुम्बदोंकेसाएमें
सदाएँदेकेयहाँपरफ़रेबखानाक्या
हरएकसम्तयहाँवहशतोंकामस्कनहै
जुनूँकेवास्तेसहराआशियानाक्या
वोचाँदऔरकिसीआसमाँपेरौशनहै
सियाहरातहैउसकीगलीमेंजानाक्या
  - Azhar Iqbal
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