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Avtar Singh Jasser
pahle pahle jaan chhidakta tha uspe
pahle pahle jaan chhidakta tha uspe | पहले पहले जान छिड़कता था उसपे
- Avtar Singh Jasser
पहले
पहले
जान
छिड़कता
था
उसपे
अब
मैं
उस
सेे
जान
छुड़ाना
चाहता
हूँ
- Avtar Singh Jasser
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न
खाओ
क़स
में
वग़ैरा
न
अश्क
ज़ाया'
करो
तुम्हें
पता
है
मेरी
जान
हक़-पज़ीर
हूँ
मैं
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Amaan Haider
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शाम-ए-फ़िराक़
अब
न
पूछ
आई
और
आ
के
टल
गई
दिल
था
कि
फिर
बहल
गया
जाँ
थी
कि
फिर
सँभल
गई
Faiz Ahmad Faiz
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अपने
होटों
की
ये
तहरीर
रखो
अपने
पास
हम
वो
'आशिक़
हैं
जो
आँखों
को
पढ़ा
करते
हैं
Meem Alif Shaz
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वही
शागिर्द
फिर
हो
जाते
हैं
उस्ताद
ऐ
'जौहर'
जो
अपने
जान-ओ-दिल
से
ख़िदमत-ए-उस्ताद
करते
हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
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इक
और
इश्क़
की
नहीं
फुर्सत
मुझे
सनम
और
हो
भी
अब
अगर
तो
मेरा
मन
नहीं
बचा
Afzal Ali Afzal
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ज़ब्त
का
ऐसे
इम्तिहान
न
ले
ऐ
मेरी
जान
मेरी
जान
न
ले
Khalid Sajjad
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रहते
थे
कभी
जिन
के
दिल
में
हम
जान
से
भी
प्यारों
की
तरह
बैठे
हैं
उन्हीं
के
कूचे
में
हम
आज
गुनहगारों
की
तरह
Majrooh Sultanpuri
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मजबूरी
में
रक़ीब
ही
बनना
पड़ा
मुझे
महबूब
रहके
मेरी
जो
इज़्ज़त
नहीं
हुई
Sabahat Urooj
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पहले
लगा
था
हिज्र
में
जाएँगे
जान
से
पर
जी
रहे
हैं
और
भी
हम
इत्मीनान
से
Ankit Maurya
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इतनी
मिलती
है
मिरी
ग़ज़लों
से
सूरत
तेरी
लोग
तुझ
को
मिरा
महबूब
समझते
होंगे
Bashir Badr
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हमेशा
के
लिए
वो
भी
हमारा
हो
नहीं
सकता
फ़क़त
इक
इश्क़
हम
से
भी
दोबारा
हो
नहीं
सकता
Avtar Singh Jasser
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फिर
दिसंबर
की
फ़ज़ा
हो
शाम
हो
हाथ
हाथों
में
तेरा
हो
शाम
हो
हों
मेरी
क़िस्मत
में
ऐसे
लम्हे
भी
मुझ
सेे
तू
लिपटा
हुआ
हो
शाम
हो
ऐ
ख़ुदा
मुझको
वो
लम्हे
से
बचा
अलविदा
उसने
कहा
हो
शाम
हो
याद
में
तुम
हाथ
में
जाम
ओ
क़दाह
बह
रही
ठंडी
हवा
हो
शाम
हो
क़ाफ़िला
'जस्सर'
तुम्हारी
याद
का
सहन
ए
दिल
में
आ
रुका
हो
शाम
हो
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Avtar Singh Jasser
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आज
मशहूर
फिर
शहर
में
प्यार
का
इक
फ़साना
हुआ
एक
लड़की
दिवानी
हुई
एक
लड़का
दिवाना
हुआ
एक
दूजे
को
जब
हम
कभी
ढूँढ़ते
ढूँढ़ते
थक
गए
अश्क
तेरा
सहारा
हुए
दर्द
मेरा
ठिकाना
हुआ
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Avtar Singh Jasser
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मैं
तो
जस्सर
और
भी
रौशन
हुआ
जब
किसी
ने
भी
बुझाया
देर
तक
Avtar Singh Jasser
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इश्क़
क़ातिल
हुआ
है
जिस-तिस
का
कोई
अपना
नहीं
हुआ
इस
का
फिर
रहा
है
वो
दर-ब-दर
तन्हा
इश्क़
कामिल
नहीं
हुआ
जिस
का
उम्र
की
तेज़
धूप
में
देखो
हुस्न
ढलने
लगा
है
नरगिस
का
वक़्त
का
इंतिज़ार
सब
को
है
वक़्त
लेकिन
है
मुन्तजि़र
किस
का
गर
जहाँ
में
ख़ुदा
न
होता
तो
आशना
कौन
होता
मुफ़लिस
का
हर
सफ़र
में
उसे
मिली
मंज़िल
रहनुमा
है
ख़ुदा
यहाँ
जिस
का
मौत
तो
आ
गई
मुझे
कब
की
मैं
अभी
भी
हूँ
मुंतज़िर
किस
का
अश्क
बरसे
थे
रात
भर
“जस्सर”
अब्र
यादों
का
दिल
में
था
खिसका
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Avtar Singh Jasser
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