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Abdulla Asif
hawa se pare tha pata jab diye ka
hawa se pare tha pata jab diye ka | हवा से परे था पता जब दिए का
- Abdulla Asif
हवा
से
परे
था
पता
जब
दिए
का
तो
कैसे
बुझा
था
दिया
मुख़बिरी
पर
बता
तो
दिया
है
कि
ये
ये
कमी
है
सुकूँ
से
करो
तब्सिरा
अब
कमी
पर
- Abdulla Asif
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जहाँ
सारे
हवा
बनने
की
कोशिश
कर
रहे
थे
वहाँ
भी
हम
दिया
बनने
की
कोशिश
कर
रहे
थे
Abbas Qamar
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दूर
इक
सितारा
है
और
वो
हमारा
है
आँख
तक
नहीं
लगती
कोई
इतना
प्यारा
है
छू
के
देखना
उसको
क्या
अजब
नज़ारा
है
तीर
आते
रहते
थे
फूल
किसने
मारा
है
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Kafeel Rana
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उतरी
हुई
नदी
को
समुंदर
कहेगा
कौन
सत्तर
अगर
हैं
आप
बहत्तर
कहेगा
कौन
पपलू
से
उनकी
बीवी
ने
कल
रात
कह
दिया
मैं
देखती
हूँ
आपको
शौहर
कहेगा
कौन
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Paplu Lucknawi
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नदी
को
कोसते
हैं
सब
किसी
के
डूब
जाने
पर
नदी
में
डूबते
को
पर
कोई
तिनका
नहीं
देता
Alankrat Srivastava
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इसे
तो
वक़्त
की
आब-ओ-हवा
ही
ठीक
कर
देगी
मियाँ
नासूर
होते
ज़ख़्म
सहलाया
नहीं
करते
shaan manral
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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अगरचे
इश्क़
में
मजनू
बड़े
बदनाम
होते
हैं
अगरचे
क़ैस
जैसे
आशिक़ों
के
नाम
होते
हैं
भटक
सकती
नहीं
जंगल
में
लैला
चाह
करके
भी
अजी
लैला
को
घर
में
दूसरे
भी
काम
होते
हैं
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Gagan Bajad 'Aafat'
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हम
इक
ही
लौ
में
जलाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
नई
हवा
से
बचाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
दरअस्ल
उसको
फ़क़त
चाय
ख़त्म
करनी
थी
हम
उसके
कप
को
सुनाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
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Zubair Ali Tabish
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मैं
अपनी
हिजरत
का
हाल
लगभग
बता
चुका
था
सभी
को
और
बस
तिरे
मोहल्ले
के
सारे
लड़के
हवा
बनाने
में
लग
गए
थे
Vikram Gaur Vairagi
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नाम
लिख
लिख
के
तिरा
फूल
बनाने
वाला
आज
फिर
शबनमीं
आँखों
से
वरक़
धोता
है
Ghulam Mohammad Qasir
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है
बाइस-ए-कुल्फ़त
यूँँ
कमाल
अपना
दिखाना
बे
चश्म-ए-बसीरत
है
तमाशाई
हमारा
Abdulla Asif
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उन
से
दोज़ख़
में
पूछ
बैठा
हूँ
शैख़
जी
आप
और
यहाँ
कैसे
Abdulla Asif
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ये
बंदगी
के
नताइज
नहीं
जो
ख़ुश
हैं
हम
वो
चाहता
ही
नहीं
था
कि
मुश्किलें
आएँ
Abdulla Asif
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मुहब्बत
नज़र
का
फ़क़त
हादसा
है
वो
ख़ुश
है
जो
इस
हादसे
से
बचा
है
वफ़ा
का
पता
पूछ
लो
हर
किसी
से
कहेंगे
यही
सब
वफ़ा
लापता
है
जिसे
भी
ज़रूरत
हो
ले
ले
मिरा
दिल
ये
पुरज़ा
निकम्मा
है
बेकार
का
है
रईसी
को
दौलत
से
तौला
है
तुमने
बताऊँ
तुम्हें
दिल
का
ये
मसअला
है
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Abdulla Asif
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साथ
में
जब
कभी
ख़्वाब
में
आएँगे
सुब्ह
होती
है
क्या
भूल
ही
जाएँगे
Abdulla Asif
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