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Aryan Mishra
kitaab
kitaab | “किताब”
- Aryan Mishra
“किताब”
एक
किताब
थी
पास
मेरे
वही
जिसे
पढ़ने
में
आलस
आता
था
लगता
था
जो
हमेशा
डेस्क
पर
रखी
रहेगी
धूल
खाएगी
कहाँ
जाएगी
जाएगी
नहीं
कहीं
कौन
पढ़ेगा
उस
किताब
को
जिस
में
भाव
का
अभाव
है
झूठ
का
प्रभाव
है
फिर
एक
दिन
एक
झूठा
मुझ
सेे
वो
किताब
ले
गया
- Aryan Mishra
बहुत
पथरा
गया
हूँ
मैं
समझ
गर
आ
गया
हूँ
मैं
जहाँ
तुम
याद
करती
थी
वहीं
भूला
गया
हूँ
मैं
ये
तोहमत
की
दरारें
हैं
बहुत
जोड़ा
गया
हूँ
मैं
मेरी
साँसें
नहीं
रुकतीं
तभी
उकता
गया
हूँ
मैं
सही
बातें
नहीं
हैं
ये
ग़लत
परखा
गया
हूँ
मैं
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Aryan Mishra
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ये
दुनिया
भी
अजब
क़िस्सों
के
मानी
चाहती
है
अब
किसी
राँझा
के
हिस्से
में
किसी
की
हीर
आती
है
Aryan Mishra
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प्यार
का
वा'दा
करने
वाले
मेरे
स्वप्न
कतरने
वाले
मुझको
देकर
चले
गए
हैं
सारे
ज़ख़्म
अखरने
वाले
आँखों
में
जब
नहीं
चढ़े
वो
दिल
में
कहाँ
उतरने
वाले
खेल
को
आधा
छोड़
गए
हैं
शय
औ
मात
से
डरने
वाले
जीना
हर
दिन
सीख
रहे
थे
मौत
से
पहले
मरने
वाले
बिगड़े
ही
जब
नहीं
सही
से
फिर
क्या
ख़ाक
सुधरने
वाले
टूटे
तो
बरसों
से
हैं
वो
जो
हैं
आज
बिखरने
वाले
भाई
साहब
आ
गए
हैं
तो
बैठ
गए
हैं
धरने
वाले
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Aryan Mishra
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वो
टूटा
बहुत
है
ये
सच
ही
तो
है
पर
न
जाने
मेरे
गाने
क्यूँ
गा
रहा
है
Aryan Mishra
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अँधेरे
में
अगर
सच्चाई
होती
मेरी
दिल
में
तिरी
परछाई
होती
अरे
हम
तो
समझते
हर
हक़ीक़त
ब-शर्ते
तुम
हमें
समझाई
होती
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Aryan Mishra
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