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A R Sahil "Aleeg"
हिक़ारत,से kyuuñ dekhte ho tawaif ko bhi bakhsh izzat
हिक़ारत,से kyuuñ dekhte ho tawaif ko bhi bakhsh izzat | हिक़ारत,से क्यूँ देखते हो, तवाइफ़ को भी बख़्श इज़्ज़त
- A R Sahil "Aleeg"
हिक़ारत,से
क्यूँ
देखते
हो,
तवाइफ़
को
भी
बख़्श
इज़्ज़त
हवस-आश्ना
मर्द
का
वो
ग़लाज़त
उठाती
है
साहब
- A R Sahil "Aleeg"
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दिन
रात
मय-कदे
में
गुज़रती
थी
ज़िंदगी
'अख़्तर'
वो
बे-ख़ुदी
के
ज़माने
किधर
गए
Akhtar Shirani
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अना
को
अपनी
समझाना
पड़ेगा
बुलाती
है,
तो
फिर
जाना
पड़ेगा
Salman Zafar
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हम
ने
क़ुबूल
कर
लिया
अपना
हर
एक
जुर्म
अब
आप
भी
तो
अपनी
अना
छोड़
दीजिए
Harsh saxena
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ग़ुरूर-ए-लुत्फ़-ए-साक़ी
नश्शा-ए-बे-बाकी-ए-मस्ताँ
नम-ए-दामान-ए-इस्याँ
है
तरावत
मौज-ए-कौसर
की
Mirza Ghalib
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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बे-ख़ुदी
में
ले
लिया
बोसा
ख़ता
कीजे
मुआ'फ़
ये
दिल-ए-बेताब
की
सारी
ख़ता
थी
मैं
न
था
Bahadur Shah Zafar
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उम्र
जो
बे-ख़ुदी
में
गुज़री
है
बस
वही
आगही
में
गुज़री
है
Gulzar Dehlvi
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ज़िंदा
रहने
की
ये
तरक़ीब
निकाली
हमने
बात
बिगड़ी
हुई
कुछ
ऐसे
सँभाली
हमने
उस
सेे
समझौता
किया
है
उसी
की
शर्तों
पे
जान
भी
बच
गई
इज़्ज़त
भी
बचा
ली
हमने
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Divyansh Shukla
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हाँ
ठीक
है
मैं
अपनी
अना
का
मरीज़
हूँ
आख़िर
मिरे
मिज़ाज
में
क्यूँँ
दख़्ल
दे
कोई
Jaun Elia
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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आँखों
में
लाल
डोरे
से
पड़ते
चले
गए
आँसू
वो
किस
हुनर
से
पिरोया
है
इश्क़
में
A R Sahil "Aleeg"
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इब्तिदा-ए-इश्क़
इक
कमज़ोर
लम्हे
की
कहानी
इख़्तिताम-ए-इश्क़
लेकिन
दास्ताँ
इक
उम्र
भर
की
A R Sahil "Aleeg"
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दिल
ही
तोड़ा
हो
सिर्फ़
ऐसा
नहीं
इश्क़
को
भी
किया
है
वो
बदनाम
A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
गर
नाम
है
ख़ुदा
का
तो
फिर
इश्क़
करना
भी
शिर्क
करने
सा
है
A R Sahil "Aleeg"
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जब
खिसकती
है
अक़्ल
आदम
की
आता
है
तब
वुजूद
में
ये
इश्क़
A R Sahil "Aleeg"
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