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A R Sahil "Aleeg"
ban gayi hai kal ki shab hi vo raqeeb ki ab dulhan
ban gayi hai kal ki shab hi vo raqeeb ki ab dulhan | बन गई है, कल की शब ही, वो रक़ीब की अब दुल्हन
- A R Sahil "Aleeg"
बन
गई
है,
कल
की
शब
ही,
वो
रक़ीब
की
अब
दुल्हन
ख़त्म
होना,
अब
तो
तय
है,
उस
रक़ीब
के
दिन
अच्छे
- A R Sahil "Aleeg"
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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यही
अंजाम
अक्सर
हम
ने
देखा
है
मोहब्बत
का
कहीं
राधा
तरसती
है
कहीं
कान्हा
तरसता
है
Virendra Khare Akela
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तुम्हारे
ख़त
में
नया
इक
सलाम
किसका
था
न
था
रक़ीब
तो
आख़िर
वो
नाम
किसका
था
Dagh Dehlvi
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सब
ख़्वाहिशें
पूरी
हों
'फ़राज़'
ऐसा
नहीं
है
जैसे
कई
अश'आर
मुकम्मल
नहीं
होते
Ahmad Faraz
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ये
इश्क़-विश्क़
का
क़िस्सा
तमाम
हो
जाए
सफ़ेद
दाढ़ी
हवस
की
गुलाम
हो
जाए
जवान
लड़कियों
बूढ़ों
से
तुम
रहो
हुश्यार
न
जाने
कौन
कहाँ
आसाराम
हो
जाए
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Paplu Lucknawi
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तमाम
शहर
की
ख़ातिर
चमन
से
आते
हैं
हमारे
फूल
किसी
के
बदन
से
आते
हैं
Farhat Ehsaas
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भरे
हुए
जाम
पर
सुराही
का
सर
झुका
तो
बुरा
लगेगा
जिसे
तेरी
आरज़ू
नहीं
तू
उसे
मिला
तो
बुरा
लगेगा
ये
आख़िरी
कंपकंपाता
जुमला
कि
इस
तअ'ल्लुक़
को
ख़त्म
कर
दो
बड़े
जतन
से
कहा
है
उस
ने
नहीं
किया
तो
बुरा
लगेगा
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Zubair Ali Tabish
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दिल
के
तमाम
ज़ख़्म
तेरी
हाँ
से
भर
गए
जितने
कठिन
थे
रास्ते
वो
सब
गुज़र
गए
Kumar Vishwas
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मिरे
सलीक़े
से
मेरी
निभी
मोहब्बत
में
तमाम
उम्र
मैं
नाकामियों
से
काम
लिया
Meer Taqi Meer
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नहीं
है
लब
पे
दिखावे
का
भी
तबस्सुम
अब
हमें
किसी
ने
मुक़म्मल
उदास
कर
दिया
है
Amaan Haider
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है
साहिल
नाम,
बस
इतना
ही
काफ़ी
है
रखो
तुम
याद,
चाहो
तो
भुला
देना
A R Sahil "Aleeg"
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शहर
भर
पर
'अज़ाब
आता
है
जब
भी
वो
बे-नक़ाब
आता
है
वो
भी
'इज़्ज़त-मआब
आता
है
शाख़
पर
जब
गुलाब
आता
है
मुँह
पे
डाले
नक़ाब
आता
है
छत
पे
जब
माहताब
आता
है
जब
हुजूम-ए-सहाब
आता
है
बर्क़
पर
भी
शबाब
आता
है
ज़ुल्म
बढ़ते
हैं
रफ़्ता-रफ़्ता
और
यक-ब-यक
इंक़िलाब
आता
है
तेज़-रौ
याद
आती
है
उसकी
जिस
तरह
सैल-ए-आब
आता
है
जुर्म
कितने
हैं
नेकियाँ
कितनी
रोज़-ए-महशर
हिसाब
आता
है
रू-ब-रू
अच्छे
दिन
नहीं
आते
जब
भी
आता
है
ख़्वाब
आता
है
क़हर
ढाता
है
नाज़
का
लश्कर
जब
किसी
पर
शबाब
आता
है
अब
कहीं
फ़ाख़्ता
नहीं
महफ़ूज़
नौचने
पर
'उक़ाब
आता
है
लब
पे
आती
हैं
सौ
तमन्नाएँ
सतह
पर
ज्यूँ
हबाब
आता
है
दम
निकलता
है
काली
रातों
का
सज
के
जब
आफ़ताब
आता
है
मय-कदा
सिर्फ़
मैं
नहीं
जाता
वो
भी
'इज़्ज़त-मआब
आता
है
लगने
लगता
है
और
भी
कमसिन
जब
किसी
पर
शबाब
आता
है
सज
सँवरता
है
जब
वो
शोला
रूह
हर
तरफ़
इल्तिहाब
आता
है
खुलने
लगते
हैं
बाब
महशर
के
ज़ुल्म
पर
जब
शबाब
आता
है
ऐसे
आता
है
मिलने
वो
साहिल
जैसे
'आली-जनाब
आता
है
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A R Sahil "Aleeg"
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फिर
मिलेंगे
कहा
था
उसने
और
मुद्दतों
रोए
हम
यक़ीं
कर
के
A R Sahil "Aleeg"
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ख़ुश
रहो
और
मुझे
भी
रहने
दो
एक
जुमले
में
ख़त्म
क़िस्सा
हुआ
A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
अब
सिर्फ़
लड़ाऊँगा
तवायफ़
से
मैं
इन
शरीफ़ों
की
मोहब्बत
का
भरोसा
क्या
है
A R Sahil "Aleeg"
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