siyaasi nafraton ki zad men aayenge humeen kab tak | सियासी नफ़रतों की ज़द में आएँगे हमीं कब तक

  - A R Sahil "Aleeg"
सियासीनफ़रतोंकीज़दमेंआएँगेहमींकबतक
भिगोकरशाहरक्खेगालहूमेंआस्तींकबतक
कईकंकरवफ़ाकीझीलमेंमैंफेंकआयाहूँ
उभरकरसत्हपरआएँगेदेखेंतहनशींकबतक
भरमकेपाँवकीज़ंजीरकोसचतोड़हीदेगा
किसीकेझूठपरकोईकरेगाभीयक़ींकबतक
रखेगावक़्तउनकेरू-ब-रूभीआइनाइकदिन
जहाँकेऐबहीदेखाकरेंगेनुक़्ता-चींकबतक
निगाहोंसेहीवोहरशख़्सकोकाफ़िरबनादेगी
बचेगीयेहवसकेसाएसेरूह-ए-अमींकबतक
अजबनफ़रतबहाताहैलहूइंसाँकाइंसाँही
लहूसेतर-बतरहोगीबताओयेज़मींकबतक
हुईपत्थरसिफ़तअबतोकिसीकीमुंतज़िरआँखें
भलायेदेखतींआख़िररुख़े-माहे-मुबींकबतक
बताकबतककरूँँसजदातेरीदहलीज़परआख़िर
झुकाऊँमैंजबींअपनीभलामह-जबींकबतक
ग़ज़लकीशक्लमेंढालूँगाकबतकअपनेदर्दो-ग़म
तराशूँगामैंकाग़ज़परयेसूरत-ए-नगींकबतक
जानेकबरिहाइसक़ैदसहमहोंगेसाहिल
सताएँगेहमारीज़ीस्तकोयेकुफ़्र-ओ-दींकबतक
  - A R Sahil "Aleeg"
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy