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Ansar Ethvi
jise dekhooñ vahii behtar rivaajon ka nahin lagta
jise dekhooñ vahii behtar rivaajon ka nahin lagta | जिसे देखूँ वही बेहतर रिवाजों का नहीं लगता
- Ansar Ethvi
जिसे
देखूँ
वही
बेहतर
रिवाजों
का
नहीं
लगता
यहाँ
हर
शख़्स
मेरे
तो
मिज़ाजों
का
नहीं
लगता
दवा
मैं
माँगता
कुछ
हूँ
मुझे
कुछ
और
देता
है
वो
चारा-गर
मुझे
बिल्कुल
इलाजों
का
नहीं
लगता
हुकूमत
करने
वाला
ही
जहाँ
भगवान
बन
जाए
समझ
लो
फिर
वहाँ
कोई
समाजों
का
नहीं
लगता
- Ansar Ethvi
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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इतने
दुख
से
भरी
है
ये
दुनिया
आँख
खुलते
ही
आँख
भर
आए
shampa andaliib
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मज़ा
चखा
के
ही
माना
हूँ
मैं
भी
दुनिया
को
समझ
रही
थी
कि
ऐसे
ही
छोड़
दूँगा
उसे
Rahat Indori
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जहाँ
जो
था
वहीं
रहना
था
उस
को
मगर
ये
लोग
हिजरत
कर
रहे
हैं
Liaqat Jafri
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एक
तरफ़
है
पूरी
दुनिया
एक
तरफ़
है
मेरा
घर
लेकिन
तुमको
बतला
दूँ
मैं
दुनिया
से
है
अच्छा
घर
सब
कमरों
की
दीवारों
पर
तस्वीरें
हैं
बस
तेरी
मुझ
सेे
ज़ियादा
तो
लगता
है
जानेमन
ये
तेरा
घर
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Tanoj Dadhich
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कल
जहाँ
दीवार
थी
है
आज
इक
दर
देखिए
क्या
समाई
थी
भला
दीवाने
के
सर
देखिए
Javed Akhtar
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ये
दुनिया
ग़म
तो
देती
है
शरीक-ए-ग़म
नहीं
होती
किसी
के
दूर
जाने
से
मोहब्बत
कम
नहीं
होती
Unknown
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जिसकी
ख़ातिर
हम
भुला
बैठे
हैं
दुनिया
दोस्तों
से
ही
उन्हें
फ़ुर्सत
नहीं
है
Shashank Shekhar Pathak
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अपना
सब
कुछ
हार
के
लौट
आए
हो
न
मेरे
पास
मैं
तुम्हें
कहता
भी
रहता
था
कि
दुनिया
तेज़
है
Tehzeeb Hafi
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सिर्फ़
ज़िंदा
रहने
को
ज़िंदगी
नहीं
कहते
कुछ
ग़म-ए-मोहब्बत
हो
कुछ
ग़म-ए-जहाँ
यारो
Himayat Ali Shayar
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जहाँ
हर
शाम
पक्षी
को
शजर
ही
याद
आता
है
मैं
दफ़्तर
से
निकलता
हूँ
तो
घर
ही
याद
आता
है
बहुत
करते
हैं
हम
कोशिश
मगर
ये
हो
नहीं
पाता
जिसे
हम
भूलना
चाहें
वो
अक्सर
याद
आता
है
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Ansar Ethvi
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परिंदा
शाम
को
घर
की
तरफ़
हर
हाल
में
आया
तेरा
भी
रंज
मुझको
यूँँ
नए
हर
साल
में
आया
Ansar Ethvi
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मैं
जैसा
चाहूँ
ये
क़िस्मत
कभी
वैसा
नहीं
रखती
बहुत
खिलवाड़
करती
है
कभी
अच्छा
नहीं
रखती
फटा
सा
नोट
हूँ
हर
बार
तो
मैं
चल
नहीं
सकता
दवा
अपना
असर
हर
बार
के
जैसा
नहीं
रखती
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Ansar Ethvi
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सच्चाई
है
कि
ऐसे
भी
मंज़र
मिले
मुझे
जब
प्यास
मिट
गई
तो
समुंदर
मिले
मुझे
हाथों
को
जिनके
चूमा
है
अपना
जिसे
कहा
इक
दिन
उन्हीं
के
हाथों
में
ख़ंजर
मिले
मुझे
अंसार
एटवी
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Ansar Ethvi
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मुझे
बेज़ार
करने
के
उसे
भी
ख़्वाब
रहते
हैं
कि
जैसे
सामने
कश्ती
के
कुछ
गिर्दाब
रहते
हैं
जिसे
देखा
गया
हो
बस
गरजने
की
ही
सूरत
में
उसी
एक
अब्र
में
लिपटे
हुए
सैलाब
रहते
हैं
उन्हीं
के
सामने
आती
है
अक्सर
मुश्किलें
सारी
वो
ही
कुछ
शख़्स
जो
सबके
लिए
बेताब
रहते
हैं
हमारे
साथ
रहकर
भी
हमारे
हो
नहीं
सकते
हमारी
बज़्म
में
ऐसे
कई
अहबाब
रहते
हैं
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Ansar Ethvi
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