jab ghoomte rahe faqat achchhe ki chaah men | जब घूमते रहे फ़क़त अच्छे की चाह में

  - Anand Verma
जबघूमतेरहेफ़क़तअच्छेकीचाहमें
आधेसेहाथधोलिए,पौनेकीचाहमें
गुरबतथी,इसलिएलगायादिलकभीनहीं
गुज़रीतमामज़िन्दगीबोसेकीचाहमें
हमनेंउगायेफूलथेतितलीकेवास्ते
लेकिनवोउड़गईकिसीभँवरेकीचाहमें
सबज़िन्दगीसेहारकरकेलेटनेकेबाद
करवटबदलबदलरहेसोनेकीचाहमें
देखीहैजिसनेमुफ़लिसीवोजनताहैये
रोटीकोभूलतेनहींकपड़ेकीचाहमें
इसबातकीख़ुशीहैकेबसचलरहीहैसाँस
कुछशौक़अबरहेनहींजीनेकीचाहमें
  - Anand Verma
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