dhalti hue suraj ki ziya dekh rahe hain | ढलते हुए सूरज की ज़िया देख रहे हैं

  - Ameer Ahmad Khusro
ढलतेहुएसूरजकीज़ियादेखरहेहैं
सदियोंसेभीअंजाम-ए-वफ़ादेखरहेहैं
बदलीहुईगुलशनकीहवादेखरहेहैं
फूलोंमेंभीकाँटोंकीअदादेखरहेहैं
राहोंमेंभटकजातेहैंकिसतरहमुसाफ़िर
मंज़िलपेखड़ेराह-नुमादेखरहेहैं
तारीख़केचेहरेसेनएदौरकेहाथों
मिटतीहुईतहरीर-ए-वफ़ादेखरहेहैं
लगताहैकिबस्तीमेंकोईबातहुईहै
हरशख़्सकोमसरूफ़-ए-दुआदेखरहेहैं
अच्छाहैबरसजाएअगरदिलकीज़बाँपर
हमदोशपेज़ुल्फ़ोंकीघटादेखरहेहैं
गलियोंमेंमदीनेकीअभीदेखनेवाले
सरकारकेनक़्श-ए-कफ़-ए-पादेखरहेहैं
एहसासकेटूटेहुएआईनेमें'ख़ुसरव'
जलतीहुईहमअपनीचितादेखरहेहैं
  - Ameer Ahmad Khusro
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy