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Ambreen Haseeb Ambar
is aarzi duniya men har baat adhuri hai
is aarzi duniya men har baat adhuri hai | इस आरज़ी दुनिया में हर बात अधूरी है
- Ambreen Haseeb Ambar
इस
आरज़ी
दुनिया
में
हर
बात
अधूरी
है
हर
जीत
है
ला-हासिल
हर
मात
अधूरी
है
कुछ
देर
की
रिम-झिम
को
मा'लूम
नहीं
शायद
जल-थल
न
हो
आँगन
तो
बरसात
अधूरी
है
क्या
ख़ूब
तमाशा
है
ये
कार-गह-ए-हस्ती
हर
जिस्म
सलामत
है
हर
ज़ात
अधूरी
है
महरूम-ए-तमाज़त
दिन
शब
में
भी
नहीं
ख़ुनकी
ये
कैसा
तअ'ल्लुक़
है
हर
बात
अधूरी
है
- Ambreen Haseeb Ambar
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रात
भर
उन
का
तसव्वुर
दिल
को
तड़पाता
रहा
एक
नक़्शा
सामने
आता
रहा
जाता
रहा
Akhtar Shirani
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शिकस्ता
दिल
शब-ए-ग़म
दर्द
रुसवाई
अरे
इतना
तो
चलता
है
मुहब्बत
में
Sapna Moolchandani
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तन्हाइयाँ
तुम्हारा
पता
पूछती
रहीं
शब-भर
तुम्हारी
याद
ने
सोने
नहीं
दिया
Unknown
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घर
में
भी
दिल
नहीं
लग
रहा
काम
पर
भी
नहीं
जा
रहा
जाने
क्या
ख़ौफ़
है
जो
तुझे
चूम
कर
भी
नहीं
जा
रहा
रात
के
तीन
बजने
को
है
यार
ये
कैसा
महबूब
है
जो
गले
भी
नहीं
लग
रहा
और
घर
भी
नहीं
जा
रहा
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Tehzeeb Hafi
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तन्हाई
के
हुजूम
में
वो
एक
तेरी
याद
जैसे
अँधेरी
रात
में
जलता
हुआ
दिया
Sagheer Lucky
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चराग़ों
को
आँखों
में
महफ़ूज़
रखना
बड़ी
दूर
तक
रात
ही
रात
होगी
Bashir Badr
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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पैसा
कमाने
आते
हैं
सब
राजनीति
में
आता
नहीं
है
कोई
भी
खोने
के
वास्ते
छम्मो
का
मुजरा
सुनते
हैं
नेता
जो
रात
भर
संसद
भवन
में
आते
हैं
सोने
के
वास्ते
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Paplu Lucknawi
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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल
है
दुनिया
मिरे
आगे
होता
है
शब-ओ-रोज़
तमाशा
मिरे
आगे
Mirza Ghalib
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रात
सोने
के
लिए
दिन
काम
करने
के
लिए
वक़्त
मिलता
ही
नहीं
आराम
करने
के
लिए
Jamal Ehsani
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वो
जंग
जिस
में
मुक़ाबिल
रहे
ज़मीर
मिरा
मुझे
वो
जीत
भी
'अंबर'
न
होगी
हार
से
कम
Ambreen Haseeb Ambar
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ऐ
आसमाँ
किस
लिए
इस
दर्जा
बरहमी
हम
ने
तो
तिरी
सम्त
इशारा
नहीं
किया
Ambreen Haseeb Ambar
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इक
हसीं
ख़्वाब
कि
आँखों
से
निकलता
ही
नहीं
एक
वहशत
है
कि
ता'बीर
हुई
जाती
है
Ambreen Haseeb Ambar
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ध्यान
में
आ
कर
बैठ
गए
हो
तुम
भी
नाँ
मुझे
मुसलसल
देख
रहे
हो
तुम
भी
नाँ
Ambreen Haseeb Ambar
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इस
आरज़ी
दुनिया
में
हर
बात
अधूरी
है
हर
जीत
है
ला-हासिल
हर
मात
अधूरी
है
Ambreen Haseeb Ambar
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