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Ambar
mujhko tumse bas itnaa hi kehna hai
mujhko tumse bas itnaa hi kehna hai | मुझको तुम सेे बस इतना ही कहना है
- Ambar
मुझको
तुम
सेे
बस
इतना
ही
कहना
है
प्यार
करोगे
दर्द
मिलेगा
दुख
होगा
- Ambar
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उदासी
का
सबब
दो
चार
ग़म
होते
तो
कह
देता
फ़ुलाँ
को
भूल
बैठा
हूँ
फ़ुलाँ
की
याद
आती
है
Ashu Mishra
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भला
तुम
कैसे
जानोगे
मिला
है
दर्द
जो
गहरा
वो
जैसे
नोचता
है
बाल
अपने
नोच
कर
देखो
Kushal "PARINDA"
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तू
अपने
सारे
दुख
जाकर
बताता
है
जिन्हें,
इक
दिन
बढ़ाएँगे
वही
ग़म-ख़्वार
तेरी
आँख
का
पानी
Siddharth Saaz
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कुल
जोड़
घटाकर
जो
ये
संसार
का
दुख
है
उतना
तो
मिरे
इक
दिल-ए-बेज़ार
का
दुख
है
शाइर
हैं
तो
दुनिया
से
अलग
थोड़ी
हैं
लोगों
सबकी
ही
तरह
हमपे
भी
घर
बार
का
दुख
है
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Ashutosh Vdyarthi
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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इस
क़दर
जज़्ब
हो
गए
दोनों
दर्द
खेंचूँ
तो
दिल
निकल
आए
Abbas Qamar
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ये
किस
मक़ाम
पे
लाई
है
ज़िंदगी
हम
को
हँसी
लबों
पे
है
सीने
में
ग़म
का
दफ़्तर
है
Hafeez Banarasi
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ज़रा
सा
ग़म
हुआ
और
रो
दिए
हम
बड़ी
नाज़ुक
तबीअत
हो
गई
है
Shahzad Ahmad
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हम
ऐसे
लोग
भी
जाने
कहाँ
से
आते
हैं
ख़ुशी
में
रोते
हैं
जो
ग़म
में
मुस्कुराते
हैं
हमारा
साथ
भला
कब
तलक
निभाते
आप
कभी
कभी
तो
हमीं
ख़ुद
से
ऊब
जाते
हैं
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Mohit Dixit
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हाए
उसके
हाथ
पीले
होने
का
ग़म
इतना
रोए
हैं
कि
आँखें
लाल
कर
ली
Harsh saxena
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तेरी
बातें
मुझे
बेचैन
की
हैं
तेरा
भी
हाल
कुछ
ऐसा
ही
है
ना
Ambar
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तुम्हें
चाहिए
थी
बदन
की
महक
हमारे
लिए
प्यार
कुछ
और
है
Ambar
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बात
होगी
बेरुख़ी
से
कब
तलक
कोई
रूठे
ज़िन्दगी
से
कब
तलक
इक
न
इक
दिन
वो
भी
समझेगा
मुझे
ये
कहूँ
मैं
हर
किसी
से
कब
तलक
ये
ज़माना
और
भी
कुछ
माँगे
है
हो
गुज़ारा
आशिक़ी
से
कब
तलक
बात
तो
करनी
ही
होगी
एक
दिन
चुप
रहोगे
ख़ामुशी
से
कब
तलक
जिस्म-ओ-जाँ
इक
दिन
मेरी
लुट
जाएगी
यूँँ
ही
जीऊँ
बे-दिली
से
कब
तलक
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Ambar
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ऐसा
भी
नहीं
था
दुनिया
में
जिस्मों
की
कमी
महसूस
हुई
मैं
अब
तक
तन्हा
क्यूँँ
रहता
गर
जिस्म
पे
मरना
ही
होता
Ambar
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दिल
धड़क
उठता
है
मेरा
अब
भी
तेरे
नाम
से
कुछ
तो
बाक़ी
रह
गया
है
तेरे
मेरे
दरमियाँ
Ambar
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