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Aman Mishra 'Anant'
ye duniya hi mujhe kya kya bulaati hai
ye duniya hi mujhe kya kya bulaati hai | ये दुनिया ही मुझे क्या क्या बुलाती है
- Aman Mishra 'Anant'
ये
दुनिया
ही
मुझे
क्या
क्या
बुलाती
है
कि
माँ
तो
आज
भी
लल्ला
बुलाती
है
- Aman Mishra 'Anant'
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जिसकी
ख़ातिर
हम
भुला
बैठे
हैं
दुनिया
दोस्तों
से
ही
उन्हें
फ़ुर्सत
नहीं
है
Shashank Shekhar Pathak
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मज़ा
चखा
के
ही
माना
हूँ
मैं
भी
दुनिया
को
समझ
रही
थी
कि
ऐसे
ही
छोड़
दूँगा
उसे
Rahat Indori
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सुतून-ए-दार
पे
रखते
चलो
सरों
के
चराग़
जहाँ
तलक
ये
सितम
की
सियाह
रात
चले
Majrooh Sultanpuri
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टक
गोर-ए-ग़रीबाँ
की
कर
सैर
कि
दुनिया
में
उन
ज़ुल्म-रसीदों
पर
क्या
क्या
न
हुआ
होगा
Meer Taqi Meer
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तुम
आसमान
पे
जाना
तो
चाँद
से
कहना
जहाँ
पे
हम
हैं
वहाँ
चांदनी
बहुत
कम
है
Shakeel Azmi
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अपना
सब
कुछ
हार
के
लौट
आए
हो
न
मेरे
पास
मैं
तुम्हें
कहता
भी
रहता
था
कि
दुनिया
तेज़
है
Tehzeeb Hafi
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चलो
ऐ
हिंद
के
सैनिक
कि
लहराएँ
तिरंगा
हम
जिसे
दुनिया
नमन
करती
है
उस
पर्वत
की
चोटी
पर
ATUL SINGH
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दुनिया
की
फ़िक्र
छोड़,
न
यूँँ
अब
उदास
बैठ
ये
वक़्त
रब
की
देन
है,
अम्मी
के
पास
बैठ
Salman Zafar
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कल
जहाँ
दीवार
थी
है
आज
इक
दर
देखिए
क्या
समाई
थी
भला
दीवाने
के
सर
देखिए
Javed Akhtar
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लगा
जब
कि
दुनिया
की
पहली
ज़रूरत
मोहब्बत
है
तब
उसने
माना
यक़ीं
हो
गया
जब
मोहब्बत
ज़रूरत
है
तब
उसने
माना
वगरना
तो
ये
लोग
उसे
ख़ुद-कुशी
के
लिए
कह
चुके
थे
उसे
आइने
ने
बताया
कि
वो
ख़ूब-सूरत
है
तब
उसने
माना
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Vikram Gaur Vairagi
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किसी
की
याद
आती
है
किसी
को
याद
करता
हूँ
मैं
ये
सब
काम
ज़ख़्मों
की
इबादत
बाद
करता
हूँ
Aman Mishra 'Anant'
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ऐसे
कोई
अन
बन
नइँ
है
बस
मेरे
मन
का
मन
नइँ
है
उलझन
में
जीवन
है
मेरा
पर
जीवन
में
उलझन
नइँ
है
इतना
एकाकी
हूँ
प्यारों
अब
साथ
अकेलापन
नइँ
हैं
वरना
मजनू
कोटा
होता
जन्नत
में
आरक्षन
नइँ
है
मैं
भी
कोई
मोहन
नइँ
हूँ
तू
भी
कोई
जोगन
नइँ
है
बेड़ी
में
भी
छन
छन
नइँ
है
पत्थर
में
भी
धड़कन
नइँ
है
मंडप
में
बैठा
हूँ
मैं
पर
क्यूँँ
तू
मेरी
दुल्हन
नइँ
है
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Aman Mishra 'Anant'
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हूँ
यूँँ
टूटा
नहीं
था
जानता
मैं
मुझे
मेरी
हँसी
से
ख़ुश
लगा
मैं
उसे
मिलना
तो
था
बेबाक
होकर
वो
आई
सामने
तो
बिछ
गया
मैं
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Aman Mishra 'Anant'
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लिखें
कैसे
कि
इच्छा
मर
चुकी
है
हमारी
डायरी
भी
भर
चुकी
है
दु'आ
अब
जितनी
मर्ज़ी
कर
ले
कोशिश
बला
ये
काम
अपना
कर
चुकी
है
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Aman Mishra 'Anant'
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माया
सर
यूँ
को
पार
आया
हूँ
राम
मैं
तेरे
द्वार
आया
हूँ
अपना
क़िस्सा
भी
कर्ण
जैसा
है
साँस
वचनों
पे
वार
आया
हूँ
माँ
की
ममता
का
मान
रखना
था
अपनी
राधा
बिसार
आया
हूँ
पात्र
बनके
किसी
कथा
का
मैं
अपनी
गाथा
को
मार
आया
हूँ
आया
हूँ
पहली
बार
ही
लेकिन
लगता
है
कितनी
बार
आया
हूँ
जीत
जिसको
प्रिये
बुरा
होता
ऐसी
बाज़ी
को
हार
आया
हूँ
कोई
क्यूँँ
पूछता
नहीं
मुझ
सेे
किस
लिए
तेज़
धार
आया
हूँ
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Aman Mishra 'Anant'
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