apni jaulaan-gaah zer-e-aasmaan samjha tha main | अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं

  - Allama Iqbal
अपनीजौलाँ-गाहज़ेर-ए-आसमाँसमझाथामैं
आबगिलकेखेलकोअपनाजहाँसमझाथामैं
बे-हिजाबीसेतिरीटूटानिगाहोंकातिलिस्म
इकरिदा-ए-नील-गूँकोआसमाँसमझाथामैं
कारवाँथककरफ़ज़ाकेपेच-ओ-ख़ममेंरहगया
मेहरमाहमुश्तरीकोहम-इनाँसमझाथामैं
इश्क़कीइकजस्तनेतयकरदियाक़िस्सातमाम
इसज़मीनआसमाँकोबे-कराँसमझाथामैं
कहगईंराज़-ए-मोहब्बतपर्दा-दारी-हा-ए-शौक़
थीफ़ुग़ाँवोभीजिसेज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँसमझाथामैं
थीकिसीदरमाँदारह-रौकीसदा-ए-दर्दनाक
जिसकोआवाज़-ए-रहील-ए-कारवाँसमझाथामैं
  - Allama Iqbal
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