dil ye kahtaa hai ki ik aalam-e-muztar dekhooñ | दिल ये कहता है कि इक आलम-ए-मुज़्तर देखूँ

  - Ali Zaheer Rizvi Lakhnavi
दिलयेकहताहैकिइकआलम-ए-मुज़्तरदेखूँ
बारिश-ए-संगमेंलोगोंकोखुलेसरदेखूँ
फिरवोमूसीकाअसानीलकाशक़होजाना
फ़ौजफ़िरऔनकामैंडूबतामंज़रदेखूँ
आइनेतोड़केदौड़ूँमैंकिसीजंगलको
अपनीसूरतकोकिसीझीलकेअंदरदेखूँ
मेरासबलेलोमुझेएकमोहब्बतदेदो
शहरमेंऐसीभीआवाज़लगाकरदेखूँ
जानताहूँकिछुपाहैवोकहींसीनेमें
काशइसदर्दकीसूरतकोमैंबाहरदेखूँ
उसनेइकरोज़मोहब्बतसेबुलायाथामुझे
मैंतोहररोज़उसेअपनेबराबरदेखूँ
दूरतकएकहीमंज़रहैमकानोंका'ज़हीर'
किसतरफ़जाऊँमैंकिसओरमिराघरदेखूँ
  - Ali Zaheer Rizvi Lakhnavi
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