vo arz-e-gham pe mashwara-e-ikhtisaar de | वो अर्ज़-ए-ग़म पे मश्वरा-ए-इख़्तिसार दे

  - Aleem Usmani
वोअर्ज़-ए-ग़मपेमश्वरा-ए-इख़्तिसारदे
कूज़ेमेंकैसेकोईसमुंदरउतारदे
दुनियाहोआख़िरतहोवोसबकोसँवारदे
तौफ़ीक़-ए-इश्क़जिसकोभीपर्वरदिगारदे
फिरदावत-ए-करमनिगह-ए-शो'ला-बारदे
अल्लाहमुस्तक़िलमुझेसब्र-ओ-क़रारदे
जिसफूलकाभीदेखिएदामनहैतारतार
कितनाबड़ासबक़हमेंफ़स्लबहारदे
दर्द-ए-जिगरशिकस्ता-दिलीबे-क़रारियाँ
क्याक्यालुत्फ़मुझकोतिराइंतिज़ारदे
वाइ'ज़उसेबताओजन्नतकेतुममज़े
ख़ुल्द-ए-बरींकालुत्फ़जिसेकू-ए-यारदे
कंगनउधरकलाईमेंघूमातोयूँँलगा
आवाज़मुझकोगर्दिश-ए-लैल-ओ-नहारदे
चेहरेपेवोसजाएहैमासूमियतकानूर
अबकौनउसकोज़हमत-ए-बोस-ओ-कनारदे
मैंहूँशहीद-ए-राह-ए-मोहब्बतमगर'अलीम'
मेराग़लतपतामिरीलौह-ए-मज़ारदे
  - Aleem Usmani
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