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Ankit Yadav
jaanta hooñ shahar ki aab-o-hawa ko
jaanta hooñ shahar ki aab-o-hawa ko | जानता हूँ शहर की आब-ओ-हवा को
- Ankit Yadav
जानता
हूँ
शहर
की
आब-ओ-हवा
को
जो
यहाँ
आया
कभी
सोता
नहीं
है
इसलिए
भी
ख़्वाहिशें
करता
नहीं
मैं
सोच
लूँ
जो
वो
कभी
होता
नहीं
है
- Ankit Yadav
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ऐ
शहर-ए-जान-ए-जाँ
ऐ
शहर-ए-हमदम
अगर
ज़िन्दा
रहे
फिर
आएँगे
हम
Shajar Abbas
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लाज़िम
है
अब
कि
आप
ज़ियादा
उदास
हों
इस
शहर
में
बचे
हैं
बहुत
कम
उदास
लोग
Bhaskar Shukla
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हम
घूम
चुके
बस्ती
बन
में
इक
आस
की
फाँस
लिए
मन
में
Ibn E Insha
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अब
के
सावन
में
शरारत
ये
मिरे
साथ
हुई
मेरा
घर
छोड़
के
कुल
शहर
में
बरसात
हुई
Gopaldas Neeraj
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आदत
सी
बना
ली
है
तुमने
तो
'मुनीर'
अपनी
जिस
शहर
में
भी
रहना
उकताए
हुए
रहना
Muneer Niyazi
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आँख
वो
इक
शहर
जिस
में
दम
घुटेगा
दिल
में
रहना
घर
में
रहने
की
तरह
है
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Neeraj Neer
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देखें
क़रीब
से
भी
तो
अच्छा
दिखाई
दे
इक
आदमी
तो
शहर
में
ऐसा
दिखाई
दे
Zafar Gorakhpuri
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बस्ती
में
अपनी
हिन्दू
मुसलमाँ
जो
बस
गए
इंसाँ
की
शक्ल
देखने
को
हम
तरस
गए
Kaifi Azmi
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तमाम
शहर
को
तारीकियों
से
शिकवा
है
मगर
चराग़
की
बैअत
से
ख़ौफ़
आता
है
Aziz Nabeel
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पानी
आँख
में
भरकर
लाया
जा
सकता
है
अब
भी
जलता
शहर
बचाया
जा
सकता
है
Abbas Tabish
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जिस
बदन
को
मैं
पढ़
नहीं
सकता
हाथ
वो
ही
किताब
आ
जाए
Ankit Yadav
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वो
अक्सर
एहतियातन
ही
नहीं
मिलता
किसी
से
मुलाक़ातें
बताती
हैं
कि
घाइल
लिस्ट
में
था
महीनों
बाद
वो
आँखें
वो
नंबर
याद
आया
वो
इक
चेहरा
न
जाने
कब
से
डायल
लिस्ट
में
था
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Ankit Yadav
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तुम्हारे
शहर
के
गरजे
हुए
थे
हमारे
गाँव
में
बरसे
हुए
थे
तेरे
बादल
से
उम्मीदें
थीं
लेकिन
हमारे
खेत
भी
तरसे
हुए
थे
न
फिर
ख़ुद
को
कभी
सुलझा
सके
वो
जो
तेरी
ज़ुल्फ़
से
उलझे
हुए
थे
सुना
है
अब
वो
बेटी
चाहती
है
वो
जिसकी
कोख
से
बेटे
हुए
थे
वो
चेहरा
अब
भी
याद
आता
है
'अंकित'
वो
जिसको
देख
कर
अंधे
हुए
थे
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Ankit Yadav
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कुछ
इस
अदास
आज
मेरी
ओर
देखती
है
वो
कि
लग
रहा
है
मुद्दतों
के
बाद
में
मिली
है
वो
वो
सोचती
है
मेरा
पहला
पहला
इश्क़
है
मगर
अब
उस
से
क्या
कहूँ
कि
मेरा
जिस्म
आख़िरी
है
वो
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Ankit Yadav
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नाम
से
एतिराज़
है
शायद
नाम
लिख
कर
मिटा
दिया
जाए
Ankit Yadav
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