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Parwez Akhtar
jab kabhi neend ha
jab kabhi neend ha | जब कभी नींद हमें वक़्त पे आने लगे है
- Parwez Akhtar
जब
कभी
नींद
हमें
वक़्त
पे
आने
लगे
है
तो
डर
के
तेरी
याद
को
आवाज़
लगा
देते
हैं
- Parwez Akhtar
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भूला
नहीं
हूँ
आज
भी
हालात
गाँव
के
हाँ,
शहर
आ
गया
हूँ
मगर
साथ
गाँव
के
दुनिया
में
मेरा
नाम
जो
रोशन
हुआ
अगर
जलने
लगेंगे
बल्ब
भी
हर
रात
गाँव
के
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Tanoj Dadhich
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ये
मुझे
नींद
में
चलने
की
जो
बीमारी
है
मुझ
को
इक
ख़्वाब-सरा
अपनी
तरफ़
खींचती
है
Shahid Zaki
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रोते
फिरते
हैं
सारी
सारी
रात
अब
यही
रोज़गार
है
अपना
Meer Taqi Meer
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कहाँ
है
तू
कि
तिरे
इंतिज़ार
में
ऐ
दोस्त
तमाम
रात
सुलगते
हैं
दिल
के
वीराने
Nasir Kazmi
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फेंक
कर
रात
को
दीवार
पे
मारे
होते
मेरे
हाथों
में
अगर
चाँद
सितारे
होते
Unknown
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जैसे
देखा
हो
आख़िरी
सपना
रात
इतनी
उदास
थीं
आँखें
Siraj Faisal Khan
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हिज्र
में
अब
वो
रात
हुई
है
जिस
में
मुझको
ख़्वाबों
में
रेल
की
पटरी,
चाकू,
रस्सी,
बहती
नदियाँ
दिखती
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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मेहरबाँ
हम
पे
हर
इक
रात
हुआ
करती
थी
आँख
लगते
ही
मुलाक़ात
हुआ
करती
थी
हिज्र
की
रात
है
और
आँख
में
आँसू
भी
नहीं
ऐसे
मौसम
में
तो
बरसात
हुआ
करती
थी
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Ismail Raaz
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ईद
के
रोज़
यही
अपनी
दु'आ
है
रब
से
मुल्क
में
अमन
का,
उलफ़त
का
बसेरा
हो
जाए
हर
परेशानी
से
हर
शख़्स
को
मिल
जाए
नजात
इस
सियह
रात
का
बस
जल्द
सवेरा
हो
जाए
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Zaki Azmi
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रात
हो,
चाँद
हो,
बारिश
भी
हो
और
तुम
भी
हो
ऐसा
मुमकिन
ही
नहीं
है
कि
कभी
हो
मिरे
साथ
Faiz Ahmad
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दीदार
हुआ
उनका
इक
मुद्दत
बाद
उन्हें
हम
देख
के
बच्चों
सा
मुस्कुराने
लगे
Parwez Akhtar
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अजब
सी
कारीगरी
है
तुम्हारे
होंठों
में
तो
फिर
हमें
अपने
लबों
से
संवारा
करो
Parwez Akhtar
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अब
मुझे
कोई
गिला
नहीं
है
तुम
भी
मेरे
हो
वो
भी
मेरा
सभी
से
अपना
वास्ता
है
सभी
से
अपनी
दुश्मनी
है
Parwez Akhtar
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सच
बोलने
दे
ज़ालिम
न
कर
ऐसा
सलूक
मुझ
सेे
मेरे
ख़्वाब
सब
हैं
टूटे
कहीं
दिल
टूट
न
जाए
Parwez Akhtar
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मैं
इतना
'आशिक़
मिज़ाज
हो
गया
हूँ
की
नफ़रत
से
मोहब्बत
हो
गई
है
Parwez Akhtar
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