manzilon ke faasle deewar-o-dar men rah ga.e | मंज़िलों के फ़ासले दीवार-ओ-दर में रह गए

  - Akhtar Hoshiyarpuri
मंज़िलोंकेफ़ासलेदीवार-ओ-दरमेंरहगए
क्यासफ़रथामेरेसारेख़्वाबघरमेंरहगए
अबकोईतस्वीरभीअपनीजगहक़ाएमनहीं
अबहवाकेरंगहीमेरीनज़रमेंरहगए
जितनेमंज़रथेमिरेहम-राहघरतकआएहैं
औरपस-ए-मंज़रसवाद-ए-रह-गुज़रमेंरहगए
अपनेक़दमोंकेनिशाँभीबंदकमरोंमेंरहे
ताक़चोंपरभीदिएख़ालीनगरमेंरहगए
करगईहैनामसेग़ाफ़िलहमेंअपनीशनाख़्त
सिर्फ़आवाज़ोंकेसाएहीख़बरमेंरहगए
ना-ख़ुदाओंनेपलटकरजानेक्यूँँदेखानहीं
कश्तियोंकेतोकईतख़्तेभँवरमेंरहगए
कैसीकैसीआहटेंअल्फ़ाज़कापैकरबनीं
कैसेकैसेअक्समेरीचश्म-ए-तरमेंरहगए
हाथकीसारीलकीरेंपाँवकेतलवोंमेंथीं
औरमेरेहम-सफ़रगर्द-ए-सफ़रमेंरहगए
क्याहुजूम-ए-रंग'अख़्तर'क्याफ़रोग-ए-बू-ए-गुल
मौसमोंकेज़ाइक़ेबूढ़ेशजरमेंरहगए
  - Akhtar Hoshiyarpuri
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy