charkh se kuchh umeed thii hi nahin | चर्ख़ से कुछ उमीद थी ही नहीं

  - Akbar Allahabadi
चर्ख़सेकुछउमीदथीहीनहीं
आरज़ूमैंनेकोईकीहीनहीं
मज़हबीबहसमैंनेकीहीनहीं
फ़ालतूअक़्लमुझमेंथीहीनहीं
चाहताथाबहुतसीबातोंको
मगरअफ़्सोसअबवोजीहीनहीं
जुरअत-ए-अर्ज़-ए-हालक्याहोती
नज़र-ए-लुत्फ़उसनेकीहीनहीं
इसमुसीबतमेंदिलसेक्याकहता
कोईऐसीमिसालथीहीनहीं
आपक्याजानेंक़द्र-ए-या-अल्लाह
जबमुसीबतकोईपड़ीहीनहीं
शिर्कछोड़ातोसबनेछोड़दिया
मेरीकोईसोसाइटीहीनहीं
पूछा'अकबर'हैआदमीकैसा
हँसकेबोलेवोआदमीहीनहीं
  - Akbar Allahabadi
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