kabhi zakham zakham nikhar ke dekh kabhi daagh daagh sanwar ke dekh | कभी ज़ख़्म ज़ख़्म निखर के देख कभी दाग़ दाग़ सँवर के देख

  - Akbar Ali Khan Arshi Zadah
कभीज़ख़्मज़ख़्मनिखरकेदेखकभीदाग़दाग़सँवरकेदेख
कभीतूभीटूटमिरीतरहकभीरेज़ारेज़ाबिखरकेदेख
सर-ए-ख़ारसेसर-ए-संगसेजोहैमेराजिस्मलहूलहू
कभीतूभीतोमिरेसंग-ए-मीलकभीरंगमेरेसफ़रकेदेख
इसीखेलसेकभीपाएगातूगुदाज़-ए-क़ल्बकीने'मतें
कभीरूठजाकभीमनकेदेखकभीजीतजाकभीहरकेदेख
येपड़ीहैंसदियोंसेकिसलिएतिरेमेरेबीचजुदाइयाँ
कभीअपनेघरतूमुझेबुलाकभीरास्तेमिरेघरकेदेख
तुझेआईनेमेंमिलसकेगातिरीअदाओंकाबाँकपन
अगरअपनाहुस्नहैदेखनातोमिरीग़ज़लमेंउतरकेदेख
वहीमेरादर्दरवाँ-दवाँवहीतेराहुस्नजवाँजवाँ
कभी'मीर'-ओ-'दर्द'केबैतपढ़कभीशे'र'दाग़'-ओ-'जिगर'केदेख
  - Akbar Ali Khan Arshi Zadah
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