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AKASH
teri yaadon se bhar jaati hain aañkhen
teri yaadon se bhar jaati hain aañkhen | तेरी यादों से भर जाती हैं आँखें
- AKASH
तेरी
यादों
से
भर
जाती
हैं
आँखें
मगर
ये
मन
नहीं
भरता
हमारा
- AKASH
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कभी
ज़िन्दगी
से
यूँँ
न
चुराया
करो
नज़र
कि
मौजूद
भी
रहो
तो
न
आया
करो
नज़र
S M Afzal Imam
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हुस्न
बला
का
क़ातिल
हो
पर
आख़िर
को
बेचारा
है
इश्क़
तो
वो
क़ातिल
जिसने
अपनों
को
भी
मारा
है
ये
धोखे
देता
आया
है
दिल
को
भी
दुनिया
को
भी
इसके
छल
ने
खार
किया
है
सहरा
में
लैला
को
भी
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Jaun Elia
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मुझको
ये
नज़र
आया
के
वो
एक
बला
है
कुछ
ख़्वाब
है
कुछ
अस्ल
है
कुछ
तर्ज
-ए-
अदा
है
वो
ग़ैर
की
आग़ोश
में
रहने
लगा
शादाँ
उसको
नहीं
मालूम
के
दिल
मेरा
जला
है
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Navneet krishna
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हम
तोहफ़े
में
घड़ियाँ
तो
दे
देते
हैं
एक
दूजे
को
वक़्त
नहीं
दे
पाते
हैं
आँखें
ब्लैक
एंड
व्हाइट
हैं
तो
फिर
इन
में
रंग
बिरंगे
ख़्वाब
कहाँ
से
आते
हैं?
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Fareeha Naqvi
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सखी
को
हमारी
नज़र
लग
न
जाए
उसे
ख़्वाब
में
रात
भर
देखते
हैं
Sahil Verma
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मुमकिन
है
कि
सदियों
भी
नज़र
आए
न
सूरज
इस
बार
अँधेरा
मिरे
अंदर
से
उठा
है
Aanis Moin
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भूलभुलैया
था
उन
ज़ुल्फ़ों
में
लेकिन
हमको
उस
में
अपनी
राहें
दिखती
थीं
आपकी
आँखों
को
देखा
तो
इल्म
हुआ
क्यूँँ
अर्जुन
को
केवल
आँखें
दिखती
थीं
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Ashraf Jahangeer
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हमारे
सीने
पे
उँगलियों
से
तुम
अपना
चेहरा
बना
रहे
थे
तुम्हें
कुछ
उस
की
ख़बर
नहीं
थी
हमारे
दिल
में
जो
चल
रहा
था
Nadim Nadeem
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उसी
के
चेहरे
पे
आँखें
हमारी
रह
जाएँ
किसी
को
इतना
भी
क्या
देखना
ज़रूरी
है
Jyoti Azad Khatri
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मैं
हर
शख़्स
के
चेहरे
को
बस
इस
उम्मीद
से
तकता
हूँ
शायद
से
मुझको
दो
आँखें
तेरे
जैसी
दिख
जाएँ
Siddharth Saaz
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इक
तरह
से
ये
भी
तो
अच्छा
हुआ
उसका
शहज़ादे
से
इक
रिश्ता
हुआ
वक़्त
हर
ज़ख़्मों
को
भर
देता
है
दोस्त
पर
हमारे
साथ
तो
उल्टा
हुआ
इक
उदासी
की
वजह
तो
ये
भी
है
पूछता
कोई
नहीं
है
क्या
हुआ
है
हवा
पर
छोड़
रक्खा
मैंने
सब
इक
दिया
हूँ
दरिया
में
बहता
हुआ
इक
मैं
हूँ
इक
उसकी
है
तस्वीर
और
कमरे
में
है
हुक्का
इक
जलता
हुआ
फिर
न
शायद
आए
मंज़र
ये
कभी
देख
लो
तुम
आदमी
मरता
हुआ
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AKASH
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बस
निकलता
ही
नहीं
है
दम
हमारा
तुम
समझ
सकते
नहीं
हो
ग़म
हमारा
हो
गया
है
हक़
अब
उस
पर
दूसरों
का
मिट
गया
है
यार
अब
परचम
हमारा
अब
सितारे
पूछते
हैं
रोज़
मुझ
सेे
कब
करेगा
चाँद
ये
चम
चम
हमारा
फोल्डर
इक
याद
का
अब
है
मिटाना
हैंग
करता
है
बहुत
सिस्टम
हमारा
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आती
नहीं
अब
याद
भी
होते
नहीं
नाशाद
भी
तूने
लगाए
ज़ख़्म
थे
तो
तू
लगाती
खाद
भी
हैं
आपके
बर्बाद
गर
हैं
आपके
आबाद
भी
कहने
लगे
हैं
झूट
अब
मिलने
लगी
है
दाद
भी
थे
मज़हबी
इतने
नहीं
हम
थे
कभी
फ़रहाद
भी
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हँसाया
भी
कभी
मुझको
रुलाया
भी
ये
थोड़ा
थोड़ा
मुझको
हिज्र
भाया
भी
तेरे
जाने
का
जाएगा
नहीं
ये
ग़म
अगर
तू
पास
मेरे
लौट
आया
भी
वो
आलम
देखा
है
तन्हाई
का
मैंने
नहीं
मुझ
सेे
था
करता
बातें
साया
भी
कभी
उसने
बनाना
है
नहीं
अपना
कभी
होने
नहीं
देना
पराया
भी
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सब्ज़
रहता
है
पानी
के
बिन
कुछ
दिनों
पेड़
इक
दम
से
तो
सूख
जाता
नहीं
AKASH
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