tumhaare hijr ki muddat ghatta rahi hooñ main | तुम्हारे हिज्र की मुद्दत घटा रही हूँ मैं

  - Aisha Ayyub
तुम्हारेहिज्रकीमुद्दतघटारहीहूँमैं
घड़ीमेंवक़्तकोउल्टाघुमारहीहूँमैं
किताब-ए-ज़िंदगीमैंनेअगरपढ़ीहीनहीं
क्यूँइम्तिहानकापरचाबनारहीहूँमैं
लगाईमैंनेकिनारेपरआँसुओंकीसबील
नदीकीप्यासकोपानीपिलारहीहूँमैं
यहीकिदिलकीसुनीहैदिमाग़सेपहले
सज़ाउसीकीमोहब्बतमेंपारहीहूँमैं
सुनाहैऔरज़ियादासितमकरेगातू
सोअपनेज़ब्तकीताक़तबढ़ारहीहूँमैं
लगाकेएकअलगज़ख़्मउसकेपहलूमें
तुम्हारेज़ख़्मकोनीचादिखारहीहूँमैं
  - Aisha Ayyub
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