kya karoon zarf-e-shanaasaai ko | क्या करूँँ ज़र्फ़-ए-शनासाई को

  - Ainuddin Azim
क्याकरूँँज़र्फ़-ए-शनासाईको
मैंतरसजाताहूँतन्हाईको
ख़ामुशीज़ोर-ए-बयाँहोतीहै
रास्तादीजिएगोयाईको
तेरेजल्वोंकीफ़रावानीहै
औरक्याचाहिएबीनाईको
उनकीहरबातबहुतमीठीहै
मुँहलगातेनहींसच्चाईको
समुंदरमैंक़तील-ए-ग़महूँ
जानताहूँतिरीगहराईको
बैठारहताहूँअकेलायूँँही
यादकरकेतिरीयकताईको
खींचलेजातेहैंकुछदीवाने
अपनीजानिबतिरेसौदाईको
उफ़तमाशा-गह-ए-दुनिया'आज़िम'
कितनीफ़ुर्सतहैतमाशाईको
  - Ainuddin Azim
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