na ab vo pahli si tarz-e-giryaa na shaam-e-gham ki hama-humee hai | न अब वो पहली सी तर्ज़-ए-गिर्या न शाम-ए-ग़म की हमा-हमी है

  - Aila Tahir
अबवोपहलीसीतर्ज़-ए-गिर्याशाम-ए-ग़मकीहमा-हमीहै
बे-अश्कआँखोंकेरतजगोंमेंख़यालसारेबुझेहुएहैं
सुनहरीघड़ियोंकालम्सथावोमिरेतकल्लुमकेबाँकपनमें
मगरयेआलमहैअबकिअल्फ़ाज़अब्र-ए-ग़ममेंघिरेहुएहैं
तुम्हारेदरकोहीतकतेरहनामचलतेजज़्बोंकीशोख़ियोंमें
मगरअबइसचश्म-ए-ना-तवाँमेंहज़ारनेज़ेगड़ेहुएहैं
धनकसाचेहराउदासहोनाफिरउसपेभीवोशफ़क़साखुलना
यक़ीनमानोकिहमसेनादाँउन्हींदिनोंकेजिएहुएहैं
वोउसकेझगड़ेहमारीख़ातिरवोसारेलोगोंसेबैररखना
कहाँहैअबकेदेखेहमकिनअदावतोंमेंघिरेहुएहैं
डसेहुएहैंयेआगहीकेजीरहेहैंमररहेहैं
पूछोइनसेसबबकोईभीयेलोगपहलेडरेहुएहैं
जोजाचुकेहैंवोलोगक्याथेकिउनकीउल्फ़तकीमहकीदुनिया
जहाँथमीथीघड़ीरुकीथीवहींपेहमभीखड़ेहुएहैं
  - Aila Tahir
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