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Faiz Ahmad
ik ajab saaniha guzar gaya aaj
ik ajab saaniha guzar gaya aaj | इक अजब सानिहा गुज़र गया आज
- Faiz Ahmad
इक
अजब
सानिहा
गुज़र
गया
आज
पूरे
दिन
तेरी
याद
आई
नहीं
- Faiz Ahmad
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तुम
उन
के
वा'दे
का
ज़िक्र
उन
से
क्यूँँ
करो
'ग़ालिब'
ये
क्या
कि
तुम
कहो
और
वो
कहें
कि
याद
नहीं
Mirza Ghalib
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ग़ुर्बत
की
ठंडी
छाँव
में
याद
आई
उस
की
धूप
क़द्र-ए-वतन
हुई
हमें
तर्क-ए-वतन
के
बाद
Kaifi Azmi
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पहले
तो
मेरी
याद
से
आई
हया
उन्हें
फिर
आइने
में
चूम
लिया
अपने-आप
को
Shakeb Jalali
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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मैं
रहा
उम्र
भर
जुदा
ख़ुद
से
याद
मैं
ख़ुद
को
उम्र
भर
आया
Jaun Elia
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दिलों
को
तेरे
तबस्सुम
की
याद
यूँँ
आई
कि
जगमगा
उठें
जिस
तरह
मंदिरों
में
चराग़
Firaq Gorakhpuri
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नहीं
आती
तो
याद
उनकी
महीनों
तक
नहीं
आती
मगर
जब
याद
आते
हैं
तो
अक्सर
याद
आते
हैं
Hasrat Mohani
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ईद
ख़ुशियों
का
दिन
सही
लेकिन
इक
उदासी
भी
साथ
लाती
है
ज़ख़्म
उभरते
हैं
जाने
कब
कब
के
जाने
किस
किस
की
याद
आती
है
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Farhat Ehsaas
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हम
भूल
सके
हैं
न
तुझे
भूल
सकेंगे
तू
याद
रहेगा
हमें
हाँ
याद
रहेगा
Ibn E Insha
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ख़ास
तो
कुछ
भी
नहीं
बदला
तुम्हारे
बाद
में
पहले
गुम
रहता
था
तुम
में,
अब
तुम्हारी
याद
में
मोल
हासिल
हो
गया
है
मुझको
इक-इक
शे'र
का
सब
दिलासे
दे
रहे
हैं
मुझको
"जस्सर"
दाद
में
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Avtar Singh Jasser
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रुख़-ए-निगाह-ए-आतिशा
से
कलाम
कर
के
आ
रहे
हैं
हम
उन
निगाहों
को
सर-ए-रह
सलाम
कर
के
आ
रहे
हैं
Faiz Ahmad
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जो
दोस्तों
से
भी
छुपाया
मैंने
तुम
वो
राज़
थी
हमें
तो
बे-वफा़ई
भी
सिखाई,
तेरे
इश्क़
ने
तुम्हें
ख़याल
में
भी
जब
छुआ
तो
बा-वुजू़
छुआ
शराबी
को
सिखाई
पारसाई,
तेरे
इश्क़
ने
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Faiz Ahmad
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जमा
हुई
बचपने
की
सब
रक़म
खा
गया
मिरी
जवानी
को
बस
तुम्हारा
ग़म
खा
गया
Faiz Ahmad
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दिल-ए-मरहूम
में
अब
जान
नहीं
आएगी
ज़िंदगी
हो
के
पशेमान
नहीं
आएगी
देख
कर
जिसको
मोहब्बत
का
तुम्हें
धोका
हुआ
अब
कभी
लब
पे
वो
मुस्कान
नहीं
आएगी
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Faiz Ahmad
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अदम
या
बूद
झूठ
है
ये
दश्त-ओ-रूद
झूठ
है
तिरी
अना
है
बरक़रार
तिरा
सुजूद
झूठ
है
न
गिन
मुझे
तू
अस्ल
में
मिरा
नुमूद
झूठ
है
हरम
में
है
न
दैर
में
तिरा
वुजूद
झूठ
है
असीरी
का
मरीज़
हूँ
मिरी
कु़यूद
झूठ
है
कि
बद-नसीबी
की
क़सम
तिरा
वरुद
झूठ
है
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Faiz Ahmad
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