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Faiz Ahmad
karam ki ik nazar kar de
karam ki ik nazar kar de | करम की इक नज़र कर दे
- Faiz Ahmad
करम
की
इक
नज़र
कर
दे
तू
हमको
हम-सफ़र
कर
दे
जो
दिल
में
है
लबों
पे
ला
तू
बात
मुख़्तसर
कर
दे
यहीं
पे
मै-ए-कोहना
को
हलाल-ओ-बे-ज़रर
कर
दे
दु'आओं
में
असर
दे
दे
नज़र
को
चश्म-ए-तर
कर
दे
मैं
उस
समय
नशे
में
था
ख़ताएँ
दर-गुज़र
कर
दे
सुकून
चाहिए
मुझको
हयात
मुख़्तसर
कर
दे
इनायत
इस
तरफ़
साक़ी
सुराही
को
इधर
कर
दे
मोहब्बतें
उभरती
हैं
वो
जिस
तरफ़
नज़र
कर
दे
हमारी
ईद
हो
जाए
वो
गर
नज़र
इधर
कर
दे
बनेगा
क्या
तिरा
'अहमद'
वो
रब्त
तर्क
अगर
कर
दे
- Faiz Ahmad
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निगाहों
के
तक़ाज़े
चैन
से
मरने
नहीं
देते
यहाँ
मंज़र
ही
ऐसे
हैं
कि
दिल
भरने
नहीं
देते
हमीं
उन
से
उमीदें
आसमाँ
छूने
की
करते
हैं
हमीं
बच्चों
को
अपने
फ़ैसले
करने
नहीं
देते
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Waseem Barelvi
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कहाँ
कहाँ
पे
उसे
ढूंढते
हैं
हम
यारों
किसी
के
लम्स
से
होता
था
जो
सुकूँ
दिल
को
Afzal Ali Afzal
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सिवाए
तालियों
के
कुछ
नहीं
मिलता
ग़ज़लगोई
फ़क़त
धंधा
सुकूँ
का
है
Neeraj Neer
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मैं
हार
रहा
हूँ
और
बड़े
इत्मीनान
से
ऐसे
की
जैसे
हार
का
मतलब
नहीं
पता
Shubham Sarkar
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एक
ही
शख़्स
नहीं
होता
सदा
दिल
का
सुकूँ
एक
करवट
पे
कभी
नींद
नहीं
आ
सकती
Rehan Mirza
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तुम
न
आए
तो
क्या
सहर
न
हुई
हाँ
मगर
चैन
से
बसर
न
हुई
मेरा
नाला
सुना
ज़माने
ने
एक
तुम
हो
जिसे
ख़बर
न
हुई
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Mirza Ghalib
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इतना
तो
ज़िंदगी
में
किसी
के
ख़लल
पड़े
हँसने
से
हो
सुकून
न
रोने
से
कल
पड़े
Kaifi Azmi
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लड़कियों
के
दुख
अजब
होते
हैं
सुख
उस
से
अजीब
हँस
रही
हैं
और
काजल
भीगता
है
साथ
साथ
Parveen Shakir
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साहिल
के
सुकूँ
से
किसे
इंकार
है
लेकिन
तूफ़ान
से
लड़ने
में
मज़ा
और
ही
कुछ
है
Aale Ahmad Suroor
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इतना
तो
ज़िन्दगी
में
किसी
के
ख़लल
पड़े
हँसने
से
हो
सुकून
न
रोने
से
कल
पड़े
जिस
तरह
हँस
रहा
हूँ
मैं
पी
पी
के
गर्म
अश्क
यूँँ
दूसरा
हँसे
तो
कलेजा
निकल
पड़े
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Kaifi Azmi
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कैसे
गुज़रेगी
ज़िन्दगी
तुम
बिन
बस
इसी
सोच
में
गुज़र
रही
है
Faiz Ahmad
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शुरू
में
दोस्त
बता
कर
यक़ीं
दिला
के
मुझे
लिपट
रही
है
अब
उस
सेे
दिखा
दिखा
के
मुझे
कुछ
इस
क़दर
नज़र-अंदाज़
करता
है
मुझे
दिल
तुम्हारी
याद
में
खो
जाता
है
भुला
के
मुझे
जो
रोया
करती
थी
बस
बात
पर
जुदाई
की
वो
आज
हस
रही
है
सामने
रुला
के
मुझे
ये
कब
पता
था
कि
मुझको
तबाह
कर
देगी
बड़ी
सज़ा
मिली
हल्का
सा
मुस्कुरा
के
मुझे
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Faiz Ahmad
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तुझे
मुझ
सेे
पहले
कोई
कहीं
ले
न
जा
चुरा
के
इसी
एक
डर
के
मारे
मिरे
बाल
झड़
रहे
हैं
Faiz Ahmad
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न
आई
किसी
काम
'अहमद
ये
फुरकत
में
मेरे
मुझे
लगता
था
शा'इरी
ज़ख़्म
भरने
लगेगी
Faiz Ahmad
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ईद
से
चंद
दिनों
पहले
ही
बिछड़े
थे
हम
यूँँ
शब-ए-कद्र
शब-ए-हिज्र
सी
गुज़री
मुझ
पर
Faiz Ahmad
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