dil-e-ghareeb ko to shayari pasand nahin | दिल-ए-ग़रीब को तो शा'इरी पसंद नहीं

  - Faiz Ahmad
दिल-ए-ग़रीबकोतोशा'इरीपसंदनहीं
मिरेनसीबकोतोशा'इरीपसंदनहीं
मैंकिसतरहसेकहूँँअपनेदिलकीबातभला
मिरेहबीबकोतोशा'इरीपसंदनहीं
तुम्हारीकैसेबनेगीभलारकी़बकेसाथ
मिरेरकी़बकोतोशा'इरीपसंदनहीं
हैकोईमुझकोदवादेसुख़नकेबदलेमें
मिरेतबीबकोतोशा'इरीपसंदनहीं
मुझेबताओकोईऔरतौर-ए-इस्तग़फार
उसअल-मुजीबकोतोशा'इरीपसंदनहीं
हमेंपसंदकरतीतोसब्रजाता
परउसअजीबकोतोशा'इरीपसंदनहीं
तुम्हाराहुस्नवजहहैजोकरताहूँवरना
मुझेमुहीबकोतोशा'इरीपसंदनहीं
मौलाकैसेकरेंगेयेहकअदाअपना
तिरेख़तीबकोतोशा'इरीपसंदनहीं
  - Faiz Ahmad
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