khada tha kab se zameen peeth par uth | खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए

  - Ahmad Nadeem Qasmi
खड़ाथाकबसेज़मींपीठपरउठाएहुए
आबआदमीहैक़यामतसेलौलगाएहुए
येदश्तसेउमडआयाहैकिसकासैल-ए-जुनूँ
किहुस्न-ए-शहरखड़ाहैनक़ाबउठाएहुए
येभेदतेरेसिवाख़ुदाकिसेमालूम
अज़ाबटूटपड़ेमुझपेकिसकेलाएहुए
येसैल-ए-आबथाज़लज़लाथापानीका
बिखरबिखरगएक़र्येमिरेबसाएहुए
अजबतज़ादमेंकाटाहैज़िंदगीकासफ़र
लबोंपेप्यासथीबादलथेसरपेछाएहुए
सहरहुईतोकोईअपनेघरमेंरुकसका
किसीकोयादआएदिएजलाएहुए
ख़ुदाकीशानकिमुंकिरहैंआदमिय्यतके
ख़ुदअपनीसुकड़ीहुईज़ातकेसताएहुए
जोआस्तीनचढ़ाएँभीमुस्कुराएँभी
वोलोगहैंमिरेबरसोंकेआज़माएहुए
येइंक़िलाबतोता'मीरकेमिज़ाजमेंहै
गिराएजातेहैंऐवाँबने-बनाएहुए
येऔरबातमिरेबसमेंथीगूँजइसकी
मुझेतोमुद्दतेंगुज़रींयेगीतगाएहुए
मिरीहीगोदमेंक्यूँँकटकेगिरपड़ेहैं'नदीम'
अभीदु'आकेलिएथेजोहाथउठाएहुए
  - Ahmad Nadeem Qasmi
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