khoon-e-dil se kisht-e-gham ko seenchta rehta hooñ main | ख़ून-ए-दिल से किश्त-ए-ग़म को सींचता रहता हूँ मैं

  - Ahmad Mushtaq
ख़ून-ए-दिलसेकिश्त-ए-ग़मकोसींचतारहताहूँमैं
ख़ालीकाग़ज़परलकीरेंखींचतारहताहूँमैं
आजसेमुझपरमुकम्मलहोगयादीन-ए-फ़िराक़
हाँतसव्वुरमेंभीअबतुझसेजुदारहताहूँमैं
तूदयार-ए-हुस्नहैऊँचीरहेतेरीफ़सील
मैंहूँदरवाज़ामोहब्बतका,खुलारहताहूँमैं
शामतकखींचेलिएफिरतेहैंइसदुनियाकेकाम
सुब्हतकफ़र्श-ए-नदामतपरपड़ारहताहूँमैं
हाँकभीमुझपरभीहोजाताहैमौसमकाअसर
हाँकिसीदिनशाकी-ए-आब-ओ-हवारहताहूँमैं
अहल-ए-दुनियासेतअ'ल्लुक़क़त्अहोताहीनहीं
भूलजानेपरभीसूरत-आश्नारहताहूँमैं
  - Ahmad Mushtaq
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