aankhoñ men jo samaaye na manzar lapet de | आँखों में जो समाए न मंज़र लपेट दे

  - Ahmad Musharraf Khawar
आँखोंमेंजोसमाएमंज़रलपेटदे
यामेरीफ़िक्रमेंकोईमहशरलपेटदे
उनकीनिगाह-ए-मस्तकादिलमेंसुरूरहै
साक़ीसेकहदोबादा-ओ-साग़रलपेटदे
दुनियाकोयूँँख़बरतोहोआलाम-ए-ज़ीस्तकी
काँटोंकेसाथआजगुल-ए-तरलपेटदे
हूँमहव-ए-ख़्वाबउनकेतसव्वुरकीगोदमें
वक़्तअपनेदर्दकाबिस्तरलपेटदे
होतागुमाँहैदेखकेबे-ताबी-ए-नज़र
क़तरेमेंजैसेकोईसमुंदरलपेटदे
अबहमकरेंगेक़ुव्वत-ए-बाज़ूसेफ़ैसला
मुंसिफ़तूअपनेअद्लकादफ़्तरलपेटदे
सहरासेजबपलटनेकाइम्कानहीनहीं
हंगाम-ए-रोज़गारमिराघरलपेटदे
आगाहरहयूँँसर्व-ओ-सनोबरबनकेजी
ऐसाहोकिकोईतिरासरलपेटदे
बार-ए-इलाहकरदेअताअज़्म-ए-हैदरी
याफिरसमझकेहर्फ़-ए-मुकर्ररलपेटदे
सय्यादमैंजोहारगयाहौसलेकीजंग
फिरख़ुदकहूँगातुझसेमिरेपरलपेटदे
  - Ahmad Musharraf Khawar
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy