tere qareeb aa ke badi uljhnon men hooñ | तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ

  - Ahmad Faraz
तेरेक़रीबकेबड़ीउलझनोंमेंहूँ
मैंदुश्मनोंमेंहूँकितिरेदोस्तोंमेंहूँ
मुझसेगुरेज़-पाहैतोहररास्ताबदल
मैंसंग-ए-राहहूँतोसभीरास्तोंमेंहूँ
तूचुकाहैसत्हपेकबसेख़बरनहीं
बे-दर्दमैंअभीउन्हींगहराइयोंमेंहूँ
यार-ए-ख़ुश-दयारतुझेक्याख़बरकिमैं
कबसेउदासियोंकेघनेजंगलोंमेंहूँ
तूलूटकरभीअहल-ए-तमन्नाकोख़ुशनहीं
याँलुटकेभीवफ़ाकेइन्हीक़ाफ़िलोंमेंहूँ
बदलामेरेबादभीमौज़ू-ए-गुफ़्तुगू
मैंजाचुकाहूँफिरभीतिरीमहफ़िलोंमेंहूँ
मुझसेबिछड़केतूभीतोरोएगाउम्रभर
येसोचलेकिमैंभीतिरीख़्वाहिशोंमेंहूँ
तूहँसरहाहैमुझपेमिराहालदेखकर
औरफिरभीमैंशरीकतिरेक़हक़होंमेंहूँ
ख़ुदहीमिसाल-ए-लाला-ए-सेहरालहूलहू
औरख़ुद'फ़राज़'अपनेतमाशाइयोंमेंहूँ
  - Ahmad Faraz
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