na niklaa munh se kuchh nikli na kuchh bhi qalb-e-muztar ki | न निकला मुँह से कुछ निकली न कुछ भी क़ल्ब-ए-मुज़्तर की

  - Agha Shayar Qazalbash
निकलामुँहसेकुछनिकलीकुछभीक़ल्ब-ए-मुज़्तरकी
किसीकेसामनेमैंबनगयातस्वीरपत्थरकी
ख़ुदासक्यूँँमाँगूँवाहमैंबंदोंसेक्यामाँगूँ
मुझेमिलजाएगीजोचीज़हैमेरेमुक़द्दरकी
तसव्वुरचाहिएशैख़सबकाएकईमाहै
सदाहैपर्दा-ए-नाक़ूसमेंअल्लाहु-अकबरकी
दिल-ए-राहत-तलबकोक़ब्रमेंक्याबे-क़रारीहै
मुझेघबराएदेतीहैउदासीइसनएघरकी
कलेजेमेंहज़ारोंदाग़दिलमेंहसरतेंलाखों
कमाईलेचलाहूँसाथअपनेज़िंदगीभरकी
सँभलकरदेखनाआराइशोंकेबादआईना
येआईनानहींहैअबयेटुकड़ेहैबराबरकी
मिरेअश'आर'शाइर'दाग़आसिफ़जाहसेपूछो
किशाहजौहरीहीजानतेहैंक़द्रगौहरकी
  - Agha Shayar Qazalbash
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