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Afzal Sultanpuri
sabr se kaam le raha tha main
sabr se kaam le raha tha main | सब्र से काम ले रहा था मैं
- Afzal Sultanpuri
सब्र
से
काम
ले
रहा
था
मैं
और
फिर
मौत
आ
गई
मुझको
मैं
उसे
भूलना
तो
चाहता
था
और
दिल-ए-रोग
खा
गई
मुझको
- Afzal Sultanpuri
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कुछ
रिश्तों
में
दिल
को
आज़ादी
नइँ
होती
कुछ
कमरों
में
रौशनदान
नहीं
होता
है
Vikram Gaur Vairagi
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तेरी
गली
को
छोड़
के
पागल
नहीं
गया
रस्सी
तो
जल
गई
है
मगर
बल
नहीं
गया
मजनूँ
की
तरह
छोड़ा
नहीं
मैं
ने
शहर
को
या'नी
मैं
हिज्र
काटने
जंगल
नहीं
गया
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Ismail Raaz
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किसी
उम्मीद
का
ये
इस्तिआरा
जान
पड़ता
है
कि
तन्हा
ही
सही
सच
झूट
से
अब
रोज़
लड़ता
है
Tarun Pandey
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उठते
नहीं
हैं
अब
तो
दु'आ
के
लिए
भी
हाथ
किस
दर्जा
ना-उमीद
हैं
परवरदिगार
से
Akhtar Shirani
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पा
ए
उम्मीद
प
रक्खे
हुए
सर
हैं
हम
लोग
हैं
न
होने
के
बराबर
ही
मगर
हैं
हम
लोग
तू
ने
बरता
ही
नहीं
ठीक
से
हम
को
ऐ
दोस्त
ऐब
लगते
हैं
ब-ज़ाहिर
प
हुनर
हैं
हम
लोग
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Abhishek shukla
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यूँँ
ही
बस
वो
मुझको
छोड़
के
सब
सेे
मिलता
रहता
है
बच्चा
भी
तो
ग़लत
किताबें
रख
लेता
है
बस्ते
में
Shahnaz Parveen Sahar
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उस
गली
ने
ये
सुन
के
सब्र
किया
जाने
वाले
यहाँ
के
थे
ही
नहीं
Jaun Elia
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इन
से
उम्मीद
न
रख
हैं
ये
सियासत
वाले
ये
किसी
से
भी
मोहब्बत
नहीं
करने
वाले
Nadim Nadeem
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इस
उम्मीद
पे
रोज़
चराग़
जलाते
हैं
आने
वाले
बरसों
ब'अद
भी
आते
हैं
Zehra Nigaah
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एक
भी
उम्मीद
की
चिट्ठी
इधर
आती
नहीं
हो
न
हो
अपने
समय
का
डाकिया
बीमार
है
Kunwar Bechain
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इस
जानिब
से
देखोगे
तो
पाक
नज़र
आएगा
उस
जानिब
से
देखोगे
तो
पाप
नज़र
आएगा
Afzal Sultanpuri
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यही
बस
इक
गिला
है
ज़िंदगी
में
कि
प्यासा
छोड़
देगा
तिश्नगी
में
मुझे
मिलने
न
आना
शहर
में
तुम
हमारा
घर
नहीं
अब
बम्बई
में
हमेशा
माँगता
था
बुत
के
आगे
नहीं
है
फ़ाइदा
इस
बंदगी
में
किसी
के
सामने
रोना
नहीं
है
ये
चलता
आ
रहा
है
आशिक़ी
में
करूँँ
मैं
पैरवी
कैसे
तुम्हारी
कि
पकड़े
जा
चुके
हो
दुश्मनी
में
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Afzal Sultanpuri
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मुनाफ़िक
और
मुशरिक
में
कहीं
अफ़ज़ल
नहीं
कोई
यहाँँ
तो
शहर
हैं
लेकिन
इधर
जंगल
नहीं
कोई
Afzal Sultanpuri
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आज
वो
भी
तड़प
रहा
होगा
आग
उस
में
भड़क
रहा
होगा
तुम
दुबारा
तलाशती
राहें
यार
कोई
सड़क
रहा
होगा
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Afzal Sultanpuri
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रोग
लग
जाए
जिसे
भी
मोहब्बत
का
यार
उसका
फातिहा
तब
पढ़ा
जाए
Afzal Sultanpuri
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