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Afzal Sultanpuri
nahin hain ishq men beemaar ham
nahin hain ishq men beemaar ham | नहीं हैं इश्क़ में बीमार हम
- Afzal Sultanpuri
नहीं
हैं
इश्क़
में
बीमार
हम
हमारा
मसअला
कुछ
और
है
- Afzal Sultanpuri
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मोहब्बत
का
सुबूत
अब
और
क्या
दें
तुम्हारी
माँ
को
माँ
कहने
लगे
हैं
Shadab Asghar
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ऐ
मौज-ए-हवादिस
तुझे
मालूम
नहीं
क्या
हम
अहल-ए-मोहब्बत
हैं
फ़ना
हो
नहीं
सकते
Asad Bhopali
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इश्क़
को
जब
हुस्न
से
नज़रें
मिलाना
आ
गया
ख़ुद-ब-ख़ुद
घबरा
के
क़दमों
में
ज़माना
आ
गया
Asad Bhopali
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और
भी
दुख
हैं
ज़माने
में
मोहब्बत
के
सिवा
राहतें
और
भी
हैं
वस्ल
की
राहत
के
सिवा
Faiz Ahmad Faiz
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इश्क़
के
इज़हार
में
हर-चंद
रुस्वाई
तो
है
पर
करूँँ
क्या
अब
तबीअत
आप
पर
आई
तो
है
Akbar Allahabadi
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इश्क़
हमारा
चाँद
सितारे
छू
लेगा
घुटनों
पर
आकर
इज़हार
किया
हमने
Darpan
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दिल
चीज़
क्या
है
दिल
से
मोहब्बत
जताए
कौन
अपना
जो
ख़ुद
न
हो
उसे
अपना
बनाए
कौन
Shakeel Badayuni
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ये
मोहब्बत
है
ये
मर
जाने
से
भी
जाती
नहीं
तू
कोई
क़ैदी
नहीं
है
जो
रिहा
हो
जाएगा
Ali Zaryoun
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कॉलिज
में
इतवार
से
चिढ़
ने
वाला
इश्क़
ऑफ़िस
में
इतवार
की
राहें
तकता
है
Kumar Kaushal
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तेरे
वादे
से
प्यार
है
लेकिन
अपनी
उम्मीद
से
नफ़रत
है
पहली
ग़लती
तो
इश्क़
करना
थी
शा'इरी
दूसरी
हिमाक़त
है
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Mehshar Afridi
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मुनाफ़िक
और
मुशरिक
में
कहीं
अफ़ज़ल
नहीं
कोई
यहाँँ
तो
शहर
हैं
लेकिन
इधर
जंगल
नहीं
कोई
Afzal Sultanpuri
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मोहब्बत
देखकर
मेरी
जहाँ
भी
ये
पिघल
जाए
तुम्हारी
याद
आई
तो
मेरे
आँसू
निकल
आए
Afzal Sultanpuri
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याद
उसकी
हमें
सताती
है
बाद
में
रात
भर
रुलाती
है
रात
गुज़रे
बग़ैर
मेरे
जो
रात
सारे
हमें
गिनाती
है
छोड़ती
क्यूँ
नहीं
मुझे
तन्हा
शाम
होते
ही
घर
बुलाती
है
जानती
है
हमें
हमेशा
से
यार
फिर
क्यूँ
हमें
जलाती
है
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Afzal Sultanpuri
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जान
बाकी
कहाँ
दीवाने
में
तीर
लग
ही
गया
निशाने
में
मौत
तो
होश
में
नहीं
लगती
क्या
करें
यार
हम
ज़माने
में
वो
जुदा
कर
गया
मुझे
ख़ुद
से
वक़्त
लगता
नहीं
भुलाने
में
शा'इरी
काम
आ
गई
मेरे
लग
गए
हम
ग़ज़ल
सुनाने
में
चाहता
था
उसे
मगर
अफ़ज़ल
डर
रहा
था
गले
लगाने
में
करबला
नाम
ही
शहादत
है
सर
कटा
था
ख़ुदा
मनाने
में
काश
रिश्ता
बचा
लिया
होता
मर
गया
मैं
यहीं
निभाने
में
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Afzal Sultanpuri
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तुम्हीं
से
हूँ
अभी
ज़िंदा
तुम्हीं
में
जी
रहा
हूँ
मैं
मोहब्बत
ज़हर
है
जानी
इसे
अब
पी
रहा
हूँ
मैं
मुझे
ख़ामोश
रहने
दो
यक़ीनन
बद
दु'आ
मैं
हूँ
लबों
को
आज
फिर
अपने
सही
से
सी
रहा
हूँ
मैं
मुझे
मरहम
बना
लेती
मगर
वो
भूल
जाती
थी
नमक
था
जिस्म
पर
उसके
जले
पर
घी
रहा
हूँ
मैं
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Afzal Sultanpuri
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