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Afzal Sultanpuri
maqsad sala-e-aam hai phir ehtiyaat kyun
maqsad sala-e-aam hai phir ehtiyaat kyun | मक़्सद सला-ए-आम है फिर एहतियात क्यूँँ
- Afzal Sultanpuri
मक़्सद
सला-ए-आम
है
फिर
एहतियात
क्यूँँ
उन
सेे
हुई
है
बात
तो
फिर
इनसे
बात
क्यूँँ
- Afzal Sultanpuri
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मौत
ने
सारी
रात
हमारी
नब्ज़
टटोली
ऐसा
मरने
का
माहौल
बनाया
हमने
घर
से
निकले
चौक
गए
फिर
पार्क
में
बैठे
तन्हाई
को
जगह-जगह
बिखराया
हमने
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Shariq Kaifi
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तेग़-बाज़ी
का
शौक़
अपनी
जगह
आप
तो
क़त्ल-ए-आम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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मैं
अकेला
ही
चला
था
जानिब-ए-मंज़िल
मगर
लोग
साथ
आते
गए
और
कारवाँ
बनता
गया
Majrooh Sultanpuri
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मिलने
का
वा'दा
उन
के
तो
मुँह
से
निकल
गया
पूछी
जगह
जो
मैंने
कहा
हँस
के
ख़्वाब
में
Unknown
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और
उसको
ढूढ़ता
मैं
किस
जगह
पास
ही
थी
और
कितनी
दूर
थी
Umesh Maurya
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तुम्हें
लगा
है
कि
मेरे
होते,
तुम्हें
भी
दिल
में
जगह
मिलेगी
बड़ी
ही
इज़्ज़त
से
कह
रहा
हूँ
,चलो
उठो
अब
मेरी
जगह
से
Shadab Asghar
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ज़िंदगी
फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता
को
पा
सकती
नहीं
मौत
ही
आती
है
ये
मंज़िल
दिखाने
के
लिए
Hafeez Jalandhari
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सुब्ह-ओ-शाम
अब
हमको
बस
उदास
रहना
है
ग़मज़दों
की
मंज़िल
का
रास्ता
उदासी
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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बुरी
सरिश्त
न
बदली
जगह
बदलने
से
चमन
में
आ
के
भी
काँटा
गुलाब
हो
न
सका
Arzoo Lakhnavi
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जिसे
देखो
दिवाना
हो
रहा
है
ग़ज़ब
सारा
ज़माना
हो
रहा
है
उसे
पाने
कि
चाहत
में
ख़ुदाया
यहाँ
मिटना
मिटाना
हो
रहा
है
वहाँ
पर
जान
की
बाज़ी
लगी
है
इधर
मिलना
मिलाना
हो
रहा
है
कहाँ
से
रोज़
मैं
लाऊँ
नयापन
नया
हर
दिन
पुराना
हो
रहा
है
हमें
रोको
नहीं
तो
ख़त्म
समझो
कि
अफ़ज़ल
भी
रवाना
हो
रहा
है
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Afzal Sultanpuri
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एक
शायर
से
इश्क़
कर
बैठी
सोचकर
क्या
वो
मुझपे
मर
बैठी
Afzal Sultanpuri
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मुहब्बत
कर
रही
हो
तुम
क़यामत
कर
रही
हो
तुम
ये
इज़्ज़त
तो
मिली
तुम
से
हिफाज़त
कर
रही
हो
तुम
कि
आयत
पढ़
रहा
था
मैं
इबादत
कर
रही
हो
तुम
सलीक़े
पर
मिरे
अफ़ज़ल
मशर्रत
कर
रही
हो
तुम
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अभी
तलवार
के
सब
घाव
रहने
दे
लगा
मरहम
नहीं
अब
घाव
रहने
दे
Afzal Sultanpuri
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किया
जब
प्यार
दिलबर
ने
हमारे
बहुत
ख़ुश
थे
जहाँ
के
सब
सितारे
नहीं
मिलना
हमें
कुछ
भी
यहाँ
पर
चले
अफ़ज़ल
ख़ुदा
के
हम
सहारे
बचा
सकते
नहीं
अब
हम
सफ़ीना
चले
आते
भला
कैसे
किनारे
मुझे
तो
नींद
भी
आती
नहीं
है
बता
हम
ज़िन्दगी
कैसे
सँवारे
लगाए
घाव
पे
मरहम
मेरे
पर
निशाँ
सब
तो
लगाए
हैं
तुम्हारे
तुम्हें
हम
सेे
मोहब्बत
थी
मगर
अब
बहुत
रोने
लगे
बच्चे
बिचारे
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Afzal Sultanpuri
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