ghamon ki dhoop men milte hain saaebaan ban kar | ग़मों की धूप में मिलते हैं साएबाँ बन कर

  - Afzal Allahabadi
ग़मोंकीधूपमेंमिलतेहैंसाएबाँबनकर
ज़मींपेरहतेहैंकुछलोगआसमाँबनकर
उड़ेहैंजोतिरेक़दमोंसेख़ाककेज़र्रे
चमकरहेहैंफ़लकपरवोकहकशाँबनकर
जिन्हेंनसीबहुईहैतिरेबदनकीनसीम
महकरहेहैंज़मींपरवोगुल्सिताँबनकर
मेंइज़्तिराबकेआलममेंरक़्सकरतारहा
कभीग़ुबारकीसूरतकभीधुआँबनकर
मिरीसदाओंकोअबतोपनाहमिलजाए
तुझेपुकाररहाहूँतिरीज़बाँबनकर
मैंइसज़मीनकीवुसअ'तपेसैरकरताहूँ
फ़लककेचाँदसितारोंकाराज़-दाँबनकर
मसर्रतोंकीफ़ज़ामेंसदावोरहतेहैं
जोग़मकेमारोंसेमिलतेहैंमेहरबाँबनकर
उन्हींकोशान-ए-चमनयेज़मानाकहताहै
चमनकोलूटरहेहैंजोबाग़बाँबनकर
मैंहर्फ़हर्फ़जिसेपढ़चुकाहूँ'अफ़ज़ल'
वरक़वरक़पेवोबिखराहैदास्ताँबनकर
  - Afzal Allahabadi
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