khumaar-e-shab men zameen ka chehra nikhar raha tha | ख़ुमार-ए-शब में ज़मीं का चेहरा निखर रहा था

  - Afzaal Naveed
ख़ुमार-ए-शबमेंज़मींकाचेहरानिखररहाथा
कोईसितारोंकीपालकीमेंउतररहाथा
नहारहेथेशजरकिसीझीलकेकिनारे
फ़लककेतख़्तेपेचाँदबैठासँवररहाथा
हवाएँदीवार-ओ-दरकेपीछेसेझाँकतीथीं
धुआँलपेटेकोईगलीसेगुज़ररहाथा
खड़ाथामेरीगलीसेबाहरजहानसारा
मैंख़्वाबमेंअपनेआपसेबातकररहाथा
हवाकाझोंकाउदासकरकेचलागयाहै
अभीअभीतोमैंजाम-ए-ग़फ़्लतकोभररहाथा
औरअबठहरजा'नवेद'आगेतोकुछनहींहै
तूउम्रभरइसख़यालसेबे-ख़बररहाथा
  - Afzaal Naveed
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