sabhi kaan khol ke sun lo baat ko phir na kehna kaha nahin | सभी कान खोल के सुन लो बात को फिर न कहना कहा नहीं

  - Prashant Kumar
सभीकानखोलकेसुनलोबातकोफिरकहनाकहानहीं
इसीवक़्तदिलसेनिकालदोमिरीज़िंदगीकापतानहीं
जिसेताड़तेजिसेछेड़तेथेनक़ाबमेंयहाँबैठकर
सोहज़ारसदियाँगुज़रगईंकहींहम-सफ़रवोमिलानहीं
तिरेगेसुओंकोसँवारनेमेंगुज़रगईमिरीज़िंदगी
तिरेहुस्नकीकभीनौकरीकामु'आवज़ातोमिलानहीं
तिरेइश्क़कीहीबहारसेहैंचमनदिलोंकेसभीजवाँ
तिरीचाहतोंकामगरगुलाबमिरेतोदिलमेंखिलानहीं
मिराज़ख़्म-ए-दिलबड़ानर्मनर्मकहींज़रामेंबिगड़जाए
तिरेहाथकाहीदियाहुआयहीसोचकरतोसिलानहीं
जोपिलारहाहैबचीकुचीहीपिलारहावोभीफेंककर
तिरेजैसातोमुझेसाक़ियाकहींभीक़समसेमिलानहीं
  - Prashant Kumar
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