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Ajeetendra Aazi Tamaam
phone par baat karte the ghanton
phone par baat karte the ghanton | फोन पर बात करते थे घंटों
- Ajeetendra Aazi Tamaam
फोन
पर
बात
करते
थे
घंटों
चैट
पर
दोनों
हाथ
रहते
थे
वक़्त
कितना
बदल
गया
देखो
हम
कभी
साथ
साथ
रहते
थे
- Ajeetendra Aazi Tamaam
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मेरे
जिस्म
से
वक़्त
ने
कपड़े
नोच
लिए
मंज़र
मंज़र
ख़ुद
मेरी
पोशाक
हुआ
Azm Shakri
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कोई
चादर
वफ़ा
नहीं
करती
वक़्त
जब
खींच-तान
करता
है
Unknown
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तुम्हारे
ख़त
को
जलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
ये
दिल
बाहर
निकलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
तुम्हारा
फ़ैसला
है
पास
रुकना
या
नहीं
रुकना
मेरी
क़िस्मत
बदलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
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Tanoj Dadhich
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माँ
की
आग़ोश
में
कल
मौत
की
आग़ोश
में
आज
हम
को
दुनिया
में
ये
दो
वक़्त
सुहाने
से
मिले
Kaif Bhopali
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वो
भी
आख़िर
तिरी
ता'रीफ़
में
ही
ख़र्च
हुआ
मैं
ने
जो
वक़्त
निकाला
था
शिकायत
के
लिए
Azhar Nawaz
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उस
ने
इस
तरह
से
बदला
है
रवय्या
अपना
पूछना
पड़ता
है
हर
वक़्त,
तुम्हीं
हो
ना
दोस्त?
Inaam Azmi
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ऐ
दिल
की
ख़लिश
चल
यूँँही
सही
चलता
तो
हूँ
उन
की
महफ़िल
में
उस
वक़्त
मुझे
चौंका
देना
जब
रंग
पे
महफ़िल
आ
जाए
Behzad Lakhnavi
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वक़्त
देता
था
वो
मिलने
का
तभी
रक्खी
थी
दोस्त
इक
दौर
था
मैंने
भी
घड़ी
रक्खी
थी
Nadir Ariz
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मुझ
में
थोड़ी
सी
जगह
भी
नहीं
नफ़रत
के
लिए
मैं
तो
हर
वक़्त
मोहब्बत
से
भरा
रहता
हूँ
Mirza Athar Zia
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उस
वक़्त
भी
अक्सर
तुझे
हम
ढूँढने
निकले
जिस
धूप
में
मज़दूर
भी
छत
पर
नहीं
जाते
Munawwar Rana
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पहले
होते
थे
कभी
पैग़म्बर
आजकल
नक़ली
ख़ुदा
होते
हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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तन्हाई
में
अक्सर
हद
से
गुजरती
है
जीने
नहीं
देती
यादों
की
पुरवाई
Ajeetendra Aazi Tamaam
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परों
को
खोल
कर
मस्ती
में
जब
उड़ते
हैं
दीवाने
उड़ानों
से
मुकम्मल
आसमाँ
पर
राज
करते
हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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दिन
बर्फ
के
जैसे
जलता
है
और
शब
कुहसार
से
ठंडी
है
इस
बार
फ़ज़ा
सरमा
की
आज़ी
पिछली
बार
से
ठंडी
है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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सही
सही
बता
है
क्या
भला
है
क्या
बुरा
है
क्या
न
इश्क़
है
न
चारा-गर
तो
दर्द
की
दवा
है
क्या
लहू
सा
लाल
लाल
है
ये
आँखों
में
जमा
है
क्या
बुझे
बुझे
से
लोग
हैं
ये
ज़िंदगी
सज़ा
है
क्या
अजीब
कशमकश
सी
है
ये
दिल
तुझे
हुआ
है
क्या
सुकून
हो
न
चैन
हो
तो
जीने
में
मज़ा
है
क्या
जो
ख़ाक
हो
रहे
हैं
हम
किसी
की
बद्दुआ
है
क्या
जला
दिया
तो
जल
गया
ये
जिस्म
बे-वफ़ा
है
क्या
बहक
रहे
हैं
देख
कर
बदन
तेरा
नशा
है
क्या
हर
एक
शय
मलंग
है
बहार
में
अदा
है
क्या
उसी
की
आरज़ू
है
क्यूँ
तमाम
वो
ख़ुदा
है
क्या
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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