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Ajeetendra Aazi Tamaam
KHuda rakhe salaamat usko aaKHir
KHuda rakhe salaamat usko aaKHir | ख़ुदा रक्खे सलामत उसको आख़िर
- Ajeetendra Aazi Tamaam
ख़ुदा
रक्खे
सलामत
उसको
आख़िर
तुम्हें
अब
जिस
सेे
उल्फ़त
हो
गई
है
- Ajeetendra Aazi Tamaam
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खटखटाने
की
कोई
ज़हमत
ही
आख़िर
क्यूँ
करे
इसलिए
भी
घर
का
दरवाज़ा
खुला
रखता
हूँ
मैं
Tousief Tabish
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अंजाम
उसके
हाथ
है
आग़ाज़
करके
देख
भीगे
हुए
परों
से
ही
परवाज़
करके
देख
Nawaz Deobandi
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या'नी
कि
इश्क़
अपना
मुकम्मल
नहीं
हुआ
गर
मैं
तुम्हारे
हिज्र
में
पागल
नहीं
हुआ
वो
शख़्स
सालों
बाद
भी
कितना
हसीन
है
वो
रंग
कैनवस
पे
कभी
डल
नहीं
हुआ
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Kushal Dauneria
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उस
के
होंटों
पे
रख
के
होंट
अपने
बात
ही
हम
तमाम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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भरे
हुए
जाम
पर
सुराही
का
सर
झुका
तो
बुरा
लगेगा
जिसे
तेरी
आरज़ू
नहीं
तू
उसे
मिला
तो
बुरा
लगेगा
ये
आख़िरी
कंपकंपाता
जुमला
कि
इस
तअ'ल्लुक़
को
ख़त्म
कर
दो
बड़े
जतन
से
कहा
है
उस
ने
नहीं
किया
तो
बुरा
लगेगा
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Zubair Ali Tabish
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कीजे
इज़हार-ए-मोहब्बत
चाहे
जो
अंजाम
हो
ज़िंदगी
में
ज़िंदगी
जैसा
कोई
तो
काम
हो
Priyamvada ilhan
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अजीब
दर्द
का
रिश्ता
था
सब
के
सब
रोए
शजर
गिरा
तो
परिंदे
तमाम
शब
रोए
Tariq Naeem
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तमाम
शहर
की
ख़ातिर
चमन
से
आते
हैं
हमारे
फूल
किसी
के
बदन
से
आते
हैं
Farhat Ehsaas
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इसी
लिए
तो
यहाँ
अब
भी
अजनबी
हूँ
मैं
तमाम
लोग
फ़रिश्ते
हैं
आदमी
हूँ
मैं
Bashir Badr
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रफ़्ता
रफ़्ता
ख़त्म
क़िस्सा
हो
गया,
होना
ही
था
वो
भी
आख़िर
मेरे
जैसा
हो
गया,
होना
ही
था
Ashar Najmi
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कंजूसी
को
ताक़
पे
रखना
होता
है
गुड़
कहने
से
कब
मुँह
मीठा
होता
है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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जब
लेता
हूँ
तेरी
ख़ुशबू
आती
है
इन
साँसों
पे
कैसे
रोक
लगाऊँ
मैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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तमन्ना
दिल
की
पूरी
करते
करते
ख़ुद
अपने
दिल
के
दुश्मन
बन
गए
हम
Ajeetendra Aazi Tamaam
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ज़माना
मर्द
होता
जा
रहा
है
बहुत
बेदर्द
होता
जा
रहा
है
फिर
इक
सफ़हा
किताब-ए-ज़िंदगी
का
वो
देखो
गर्द
होता
जा
रहा
है
नहीं
बच
पायेगा
ये
साल
भी
अब
दिसंबर
सर्द
होता
जा
रहा
है
गिरेगा
टूट
कर
जल्दी
शजर
से
ये
पत्ता
ज़र्द
होता
जा
रहा
है
बनेगा
दर्द
का
कारण
किसी
दिन
वो
जो
हमदर्द
होता
जा
रहा
है
उठो
जागो
मिटा
दो
बेबसी
को
बहुत
सरदर्द
होता
जा
रहा
है
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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धर्म
से
जोड़ा
गया
है
जाति
में
तोला
गया
है
आदमी
को
जान-ए-मन
कब
आदमी
समझा
गया
है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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