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Ajeetendra Aazi Tamaam
bhedta kiranoon se apni teergii ko
bhedta kiranoon se apni teergii ko | भेदता किरणों से अपनी तीरगी को
- Ajeetendra Aazi Tamaam
भेदता
किरणों
से
अपनी
तीरगी
को
सूर्य
उठता
आ
रहा
देखो
उफ़ुक़
पर
जीतनी
है
तुमको
गर
हर
इक
चुनौती
टांग
दो
डर
को
उठा
जज़्बे
की
हुक
पर
- Ajeetendra Aazi Tamaam
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पहले
सौ
बार
इधर
और
उधर
देखा
है
तब
कहीं
डर
के
तुम्हें
एक
नज़र
देखा
है
Majrooh Sultanpuri
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फ़ुर्सत
नहीं
मुझे
कि
करूँँ
इश्क़
फिर
से
अब
माज़ी
की
चोटों
से
अभी
उभरा
नहीं
हूँ
मैं
डर
है
कहीं
ये
ऐब
उसे
रुस्वा
कर
न
दे
सो
ग़म
में
भी
शराब
को
छूता
नहीं
हूँ
मैं
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Harsh saxena
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ग़म-ए-हयात
ने
आवारा
कर
दिया
वर्ना
थी
आरज़ू
कि
तिरे
दर
पे
सुब्ह
ओ
शाम
करें
Majrooh Sultanpuri
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मुझे
ये
डर
है
तेरी
आरज़ू
न
मिट
जाए
बहुत
दिनों
से
तबीअत
मिरी
उदास
नहीं
Nasir Kazmi
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शे'र
दर-अस्ल
हैं
वही
'हसरत'
सुनते
ही
दिल
में
जो
उतर
जाएँ
Hasrat Mohani
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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राम
होने
में
या
रावण
में
है
अंतर
इतना
एक
दुनिया
को
ख़ुशी
दूसरा
ग़म
देता
है
हम
ने
रावण
को
बरस
दर
बरस
जलाया
है
कौन
है
वो
जो
इसे
फिर
से
जनम
देता
है
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Kumar Vishwas
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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जैसे
ग़लत
पते
पे
चला
आए
कोई
शख़्स
सुख
ऐसे
मेरे
दर
पे
रुका
और
गुज़र
गया
Rajesh Reddy
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इस
दर
का
हो
या
उस
दर
का
हर
पत्थर
पत्थर
है
लेकिन
कुछ
ने
मेरा
सर
फोड़ा
हैं
कुछ
पर
मैं
ने
सर
फोड़ा
है
Zubair Ali Tabish
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जितना
जी
चाहे
दिलों
से
खेल
लो
पर
ख़ुशी
फिर
भी
नहीं
होगी
तुम्हें
और
भी
लाखों
सजाएँ
हैं
यहाँ
माना
की
फाँसी
नहीं
होगी
तुम्हें
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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कंजूसी
को
ताक़
पे
रखना
होता
है
गुड़
कहने
से
कब
मुँह
मीठा
होता
है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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वफ़ा
करना
हमें
खलता
रहा
है
मुहब्बत
में
ये
दिल
जलता
रहा
है
ग़मों
की
आँधियाँ
सहते
रहे
हैं
ज़फ़ा
का
सिलसिला
चलता
रहा
है
ख़ता
करना
हमें
मंज़ूर
कब
था
ख़ता-वारों
को
ये
खलता
रहा
है
निकल
आए
हर
इक
जंजाल
से
हम
ज़माना
हाथ
को
मलता
रहा
है
हुई
जिस
पर
बुज़ुर्गों
की
इनायत
हक़ीक़ी
राह
पर
चलता
रहा
है
घटा
कर
साँसें
देता
है
नया
दिन
समय
हर
शख़्स
को
छलता
रहा
है
तराशो
ज़ेहन
को
दिन
रात
अपने
बदन
का
हुस्न
तो
ढलता
रहा
है
उसे
पाने
की
कोशिश
में
लगे
हैं
जिगर
में
ख़्वाब
जो
पलता
रहा
है
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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रंगतें
रंगों
ने
पाई
आपसे
आपको
रंगों
से
क्यूँ
परहेज़
है
जिस
सेे
चाहे
उस
सेे
होली
खेलिए
ज़िंदगी
हर
रंग
से
लबरेज़
है
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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दिल
को
न
थी
उमीद
कि
बदलेगा
ये
नसीब
लेकिन
बदल
गया
है
ख़ुदा
का
लिखा
हुआ
Ajeetendra Aazi Tamaam
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