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Aatish Indori
badan se vo libaason ko hatana chahta hai
badan se vo libaason ko hatana chahta hai | बदन से वो लिबासों को हटाना चाहता है
- Aatish Indori
बदन
से
वो
लिबासों
को
हटाना
चाहता
है
अदब
से
देखना
पर
यह
भरोसा
चाहता
है
- Aatish Indori
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हाथ
गुल
से
औ
बदन
में
रातरानी
की
महक
आपको
लड़की
नहीं
इक
बाग़
होना
चाहिए
Ashish Awasthi
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कभी
मिलता
नहीं
क्यूँ
मुझ
को
मुझ
में
कहाँ
है
गर
मेरे
अंदर
ख़ुदा
है
भटकती
है
कहीं
और
ही
मेरी
रूह
बदन
मेरा
कहीं
और
ही
पड़ा
है
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Chandan Sharma
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ये
इश्क़
आग
है
और
वो
बदन
शरारा
है
ये
सर्द
बर्फ़
सा
लड़का
पिघलने
वाला
है
Shadab Asghar
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जिस्म
चादर
सा
बिछ
गया
होगा
रूह
सिलवट
हटा
रही
होगी
Kumar Vishwas
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पिघल
रहा
है
दुपहरी
में
यूँँ
वो
मोम
बदन
कहाँ
कहाँ
से
न
गुजरेगा
पसीना
हाए
Vishnu virat
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कभी
देखा
नहीं
जिसने
बदन
के
आगे
कुछ
भी
भला
वो
क्यूँ
मुहब्बत
जावेदाना
ढूँढता
है
Chandan Sharma
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हुआ
ही
क्या
जो
वो
हमें
मिला
नहीं
बदन
ही
सिर्फ़
एक
रास्ता
नहीं
ये
पहला
इश्क़
है
तुम्हारा
सोच
लो
मेरे
लिए
ये
रास्ता
नया
नहीं
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Azhar Iqbal
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ये
सारा
जिस्म
झुक
कर
बोझ
से
दोहरा
हुआ
होगा
मैं
सजदे
में
नहीं
था
आप
को
धोखा
हुआ
होगा
Dushyant Kumar
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ये
जिस्म
तंग
है
सीने
में
भी
लहू
कम
है
दिल
अब
वो
फूल
है
जिस
में
कि
रंग-ओ-बू
कम
है
Pallav Mishra
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मैं
जानता
हूँ
तेरी
रूह
की
तलब
जानाँ
तुझे
बदन
की
तरफ़
से
नहीं
छूउँगा
मैं
Subhan Asad
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ज़िंदगी
तेरे
लिए
मौत
से
रहमत
माँगूँ
इतनी
अच्छी
नहीं
गुज़री
है
कि
मोहलत
माँगूँ
Aatish Indori
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ख़ुदा
के
घर
सड़क
कोई
नहीं
जाती
चलो
पैदल
वहाँ
लारी
नहीं
जाती
चली
जाती
है
हँसने
और
हँसाने
से
दवा
खाने
से
बीमारी
नहीं
जाती
ज़ियादा
सोचने
से
नींद
जाती
है
मगर
इस
सेे
परेशानी
नहीं
जाती
मुआफ़ी
माँ
ने
दे
दी
ख़्वाब
में
आकर
मगर
सर
से
पशेमानी
नहीं
जाती
उसे
जाने
दिया
रोका
नहीं
मैं
ने
कभी
उसकी
ये
हैरानी
नहीं
जाती
बढ़ाते
जाते
हैं
हर
रोज़
आबादी
मगर
शहरों
की
वीरानी
नहीं
जाती
मुहब्बत
हो
गई
तो
हो
गई
आतिश
कभी
ये
वाली
बीमारी
नहीं
जाती
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Aatish Indori
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हाँ
कभी
की
नहीं
जानाँ
ने
अधर
में
रक्खा
उम्र
भर
मुझको
मुहब्बत
के
सफ़र
में
रक्खा
उसने
हीरों
को
मेरी
राह-गुज़र
में
रक्खा
इसलिए
ख़ुद
को
सदा
मैंने
सफ़र
में
रक्खा
दिल
में
हालाँकि
जगह
दे
नहीं
पाई
लेकिन
उम्र
भर
उसने
मुझे
अपनी
नज़र
में
रक्खा
उम्र
भर
बन
के
किसी
और
की
रही
मनकूहा
उम्र
भर
उसने
किसी
और
को
घर
में
रक्खा
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Aatish Indori
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मैं
समझती
थी
कि
वे
जान
समझते
हैं
मुझे
असलियत
निकली
कि
बे-जान
समझते
हैं
मुझे
Aatish Indori
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यूँँ
तो
कोठियाँ
हैं
यहाँ
बहुत
मुझे
फिर
भी
लोग
मिले
नहीं
मैं
समझ
गया
भले
देर
से
बड़े
शहर
दिल
के
बड़े
नहीं
वो
हमारे
गाँव
में
आते
थे
बड़े
शहर
वाले
वो
लोग
थे
कभी
फ़ोन
उन
का
लगा
नहीं
कभी
वो
पते
पे
मिले
नहीं
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Aatish Indori
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