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Aatish Indori
sunta kab hai vo kahaanii ko kahaanii kii tarah
sunta kab hai vo kahaanii ko kahaanii kii tarah | सुनता कब है वो कहानी को कहानी की तरह
- Aatish Indori
सुनता
कब
है
वो
कहानी
को
कहानी
की
तरह
जज़्ब
मिट्टी
में
वो
हो
जाता
है
पानी
की
तरह
एक
और
वजह
है
जिस
वजह
से
भाती
हो
मुझे
तुम
सुनाती
हो
कहानी
मेरी
नानी
की
तरह
मत
तलाशो
किसी
किरदार
में
अपनी
ख़ुशबू
तुम
कहानी
को
सुनो
यार
कहानी
की
तरह
आपको
सूट
पुराना
ही
पहन
आना
था
दूसरे
रंग
नहीं
फबते
हैं
धानी
की
तरह
- Aatish Indori
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ज़िंदगानी
किस
तरह
से
कुफ़्त
है
जो
ज़रूरी
है
वो
सब
कुछ
मुफ़्त
है
मिलती
है
तो
मिलती
है
इक
दफ़ा
ही
सोचना
मत
की
मुहब्बत
मुफ़्त
है
ख़ुद
ही
चुनिए
जीतना
या
हारना
जीत
उसकी
जिस्म
जिसका
चुफ़्त
है
क़ैस
लैला
की
कहानी
क्या
कहूँ
जानिए
ख़ुद
की
मुहब्बत
उफ़्त
है
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जिसकी
जैसी
समझ
वहीं
पहुँचे
लोग
तह
तक
मगर
नहीं
पहुँचे
बेवफ़ाओं
की
बात
क्या
कीजे
वे
अभागे
कहीं
नहीं
पहुँचे
क्या
सुनाएँ
व्यथा
बुढ़ापे
की
घर
पहुँच
के
भी
घर
नहीं
पहुँचे
तोड़
कर
जिनसे
आए
थे
रिश्ते
घूम
फिर
कर
मगर
वहीं
पहुँचे
रूह
की
बात
कर
रही
थी
मैं
आप
लेकिन
सही
नहीं
पहुँचे
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सीधा-सीधा
सवाल
पूछूँगा
मुस्कुराकर
के
हाल
पूछूँगा
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उसकी
चाहत
की
थाह
देखूँगा
सब
सेे
पहले
निगाह
देखूँगा
क्या
मुझे
सिर्फ़
तुम
ही
देखोगे
मैं
भी
होते
तबाह
देखूँगा
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Aatish Indori
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क्या
बताएँ
तुम्हें
कि
कितनी
पी
मापनी
में
ले
कर
के
थोड़ी
पी
हम
तो
हैं
असल
पीने
वाले
लोग
हम
नहीं
देखते
कि
कितनी
पी
जान-ए-जानाँ
नियम
नहीं
तोड़ा
जितनी
थी
हमने
उतनी
पूरी
पी
तेरा
हिस्सा
मैं
कैसे
पी
जाता
इसलिए
आधी
छोड़ी
आधी
पी
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