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Aatish Indori
qaid manzar ko ki.e baithe hain
qaid manzar ko ki.e baithe hain | क़ैद मंज़र को किए बैठे हैं
- Aatish Indori
क़ैद
मंज़र
को
किए
बैठे
हैं
ज़िंदगानी
को
जिए
बैठे
हैं
इस
सेे
बेहतर
कोई
हो
तो
लाओ
हम
मुहब्बत
को
पिए
बैठे
हैं
रास्ता
कोई
न
पूछे
हम
सेे
इसलिए
होंठ
सिए
बैठे
हैं
जो
बयाँ
हो
नहीं
सकते
आतिश
हम
वो
लम्हात
जिए
बैठे
हैं
- Aatish Indori
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न
हो
क़मीज़
तो
घुटनों
से
पेट
ढक
लेंगे
ये
लोग
कितने
मुनासिब
हैं
इस
सफ़र
के
लिए
Dushyant Kumar
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रास्ता
भूल
के
आ
निकले
हैं
हम
तेरे
लोग
नहीं
थे
दुनिया
Ashraf Yousafi
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न
हम-सफ़र
न
किसी
हम-नशीं
से
निकलेगा
हमारे
पाँव
का
काँटा
हमीं
से
निकलेगा
Rahat Indori
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जो
भी
होना
था
हो
गया
छोड़ो
अब
मैं
चलता
हूँ
रास्ता
छोड़ो
अब
तो
दुनिया
भी
देख
ली
तुमने
अब
तो
ख़्वाबों
को
देखना
छोड़ो
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Vikram Sharma
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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हुआ
ही
क्या
जो
वो
हमें
मिला
नहीं
बदन
ही
सिर्फ़
एक
रास्ता
नहीं
ये
पहला
इश्क़
है
तुम्हारा
सोच
लो
मेरे
लिए
ये
रास्ता
नया
नहीं
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Azhar Iqbal
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सफ़र
से
लौट
जाना
चाहता
है
परिंदा
आशियाना
चाहता
है
Shakeel Jamali
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यक़ीन
हो
तो
कोई
रास्ता
निकलता
है
हवा
की
ओट
भी
ले
कर
चराग़
जलता
है
Manzoor Hashmi
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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मेरे
दरवाज़े
पे
खुशियाँ
रास्ता
तकती
रही
और
हम
कमरे
से
तेरी
खिड़कियाँ
तकते
रहे
Himanshu Kiran Sharma
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बिना
नज़रों
में
आए
की
निगहबानी
हमारी
बहुत
भाई
हमें
जानाँ
अदाकारी
तुम्हारी
Aatish Indori
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बेवजह
के
ख़याल
आते
हैं
रात
दिन
एहतिमाल
आते
हैं
तेरा
जब
भी
ख़याल
आता
है
मन
में
ढेरों
सवाल
आते
हैं
आपको
एक
बार
क्या
देखा
ख़्वाब
में
अब
ग़ज़ाल
आते
हैं
वस्ल
की
रात
ख़त्म
होने
पर
हिज्र
के
माह-ओ-साल
आते
हैं
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Aatish Indori
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ख़ुद
को
बीमार
मत
किया
कर
यार
डूब
कर
प्यार
मत
किया
कर
यार
जब
मदद
चाहे
कोई
ग़ैरतमंद
तब
तो
इनकार
मत
किया
कर
यार
एक
छोटी
सी
है
मेरी
दरख़्वास्त
पीठ
पर
वार
मत
किया
कर
यार
ख़ुद
के
खाने
के
लाले
पड़
जाएँ
इतना
उपकार
मत
किया
कर
यार
दिल
को
जाना
जहाँ
है
जाने
दे
दिल
से
तकरार
मत
किया
कर
यार
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Aatish Indori
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परिंदों
से
मिल-जुल
रहे
हैं
दरीचे
नए
खुल
रहे
हैं
किसी
प्याज़
की
तरह
हम
भी
परत
दर
परत
खुल
रहे
हैं
तराज़ू
से
अब
तो
हटा
लो
बहुत
वक़्त
से
तुल
रहे
हैं
महाराज
चिंतित
बहुत
हैं
परिंदों
के
पर
खुल
रहे
हैं
बचाना
है
रिश्ता
तभी
तो
लगातार
मिल-जुल
रहे
हैं
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Aatish Indori
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चाबियाँ
जिसकी
मैं
बामी
में
रखूँगा
नफ़रतों
को
उस
तिजोरी
में
रखूँगा
चाव
से
सब
इस
कहानी
को
सुनेंगे
बेवफ़ाओं
को
कहानी
में
रखूँगा
झूट
बोलेगा
मगर
सच्चा
लगेगा
पात्र
इक
ऐसा
कहानी
में
रखूँगा
बंद
हो
रस्ता
या
चाहे
आग
बरसे
हर
समय
ख़ुद
को
रवानी
में
रखूँगा
यूँँ
सजाऊँगा
मैं
माँ
की
धानी
साड़ी
चाँद
तारों
को
किनारी
में
रखूँगा
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Aatish Indori
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